Pgdt MTT 51 DEC 2023 NOTES

 




प्रश्न 1. अनुवाद के अर्थ एवं स्वरूप पर प्रकाश डालिए|


उत्तर:

 अनुवाद एक भाषा में कही गई बात को दूसरी भाषा में कहना है। "अनुवाद" मूल रूप से संस्कृत का शब्द है जो अनु+ वाद के संयोग से बना है। जहां अनु का अर्थ पिछे तथा वाद का अर्थ कथन/विचार/भाषण (भाव वाचक संज्ञा)  आदि है। इस प्रसार अनुवाद शब्द का व्युत्पतिक अर्थ है - अनुकथन  है अर्थात किसी की कही बातों को पुनः अधिक स्पष्टता से कहना। 


अनुवाद के समानार्थी में कई शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है जैसे - अनुवचन, अनुवाक, पश्चात्ककथन, भाषानुवाद, आवृति, सार्थक आवृति आदि।


भारतीय शिक्षा पद्धति विशेषकर प्राचीनकालीन शिक्षा में गुरुकुल, गुरू और शिष्य का महत्त्व था। गुरू जो भी मंत्र या कथन उच्चारण करते थे शिष्य भी उनकी बारंबार पुनरुक्ति करते थे। इसी मौखिक पुनरूक्ति व्यवस्था को आज के अनुवाद शब्द की उत्पति ओर अर्थ से समझा  जाता है।


हिंदी के अनुवाद शब्द  अंग्रेजी में "Translation" शब्द के रुप मे प्रचलित है जो translate (Verb ) का संज्ञा रूप है। TRANSLATE शब्द की उत्पति लैटिन शब्द"Translatum से हुई है जो"TRANS+LATUM से बना है। जहां Trans का अर्थ है - beyond, through,across (उस पार) तथा latum का अर्थ है - to carry (ले जाना)

इस प्रकार व्युत्पति के आधार पर translation का अर्थ है - दूसरी और ले जाना।


व्युत्पत्ति के आधार पर , हम कह सकते हैं कि ट्रांसलेशन के ज़रिए हम एक भाषा के पाठ को दूसरी भाषा में ले जाते हैं, संप्रेषित करते हैं अथवा प्रस्तुत करते हैं।

अनुवाद, स्रोत भाषा में व्यक्त कथ्य को लक्ष्य भाषा में अंतरित करने की प्रक्रिया है।


अनुवाद, दो भिन्न भाषा समुदायों के बीच संवाद स्थापित करने की अवधारणा है।


Translation शब्द कई अर्थ छटाओं का उद्घोषक है। जिनमें से कुछ प्रमुख अनुवाद सिद्धांतकारों की चर्चा अधोलिखित है:

  • भारत के श्रेष्ठ अनुवाद सिद्धांतकार श्री आर. रघुनाथ राव जी ने अपनी कृति " The Art of Translation:A Critical Study" में translation शब्द की निम्नलिखित आठ अर्थ छटाओं की चर्चा की है:

    1. Removal or transference of a physical object ( किसी भौतिक वस्तु का विलोपन या स्थानांतरण)

    2. Removal or transference of a man from one office/change to another ( किसी व्यक्ति का एक कार्यालय/दायित्व से दूसरे कार्यालय/दायित्व मे परिवर्तन)

    3. Transference to heaven or to another world( स्वर्गिक अंतरण/लोकांतरण)

    4. Alternation/change (रूप परिर्वतन)

    5. Transformation or change of appearance ( रूप मे परिवर्तन)

    6. Art or process of changing words to express the sense of a passage in another language ( एक भाषा में लिखें पाठ के भावार्थ को अन्य भाषा के समानार्थी प्रतीकों में बदलने की कला या प्रक्रिया)

    7. Explanation or interpretation ( व्याख्या/अर्थ निर्धारण)

    8. Version (संस्करण, जिसे अन्य भाषा में परिवर्तन किया जाता है)

  • संस्कृत -अंग्रेजी कोशकार वी. एस. आप्टे "translation" शब्द की व्याख्या इस प्रकार की है: 

    1. Repetition (in general: सामान्य रुप से आवृति)

    2. Repetition by way of explanation, illustration or corroboration (व्याख्या, उदाहरण, या समर्थन की दृष्टि से आवृति)

    3. Explanatory repetition or reference to what is already mentioned, particularly any portion of the Brahmans which comments on,illustrates or explains a VIDHI or direction previously laid down and which does not itself lay down any direction ( पूर्वकथित बात का उल्लेख विशेषकर ब्रह्मण ग्रंथों का वह भाग जिसमें पूर्वोक्त निर्देश अथवा विधि की व्याख्या/चित्रन/या उसकी टिप्प्णी निहित है एवं जो स्वयं कोई विधि या निदेश नही है।)

    4. Corroboration (समर्थन)

    5. Report (विवरण)

    6. Rumour (अफ़वाह)

    7. Translation (अनुवाद)




व्युत्पत्ति के आधार पर "अनुवाद" ओर "translation"  शब्दों में समानता/भेद 


समानता

  • दोनों शब्दों में अनुवाद के विषय पर बल दिया गया है।

 vs भेद 

  • प्राचिन अर्थ में अनुवाद का अर्थ शब्दो के पुनरावृति अथवा अर्थ की बार बार दोहराव था वहीं आधुनिक अर्थ में ट्रांसलेशन/अनुवाद को केवल शबद के दोहराव अर्थ न होकर उसके अर्थ में भी समुचित परिर्वतन करना है।


  • हालांकि इनमे व्युत्पतिपरक थोडी भेद स्पष्ट होते हैं किंतु वास्तव में इनमे कोई मौलिक विभिनता नहीं है क्योंकी जहां अनुवाद में अर्थ के दोहराने की भाव निहित है वहीं ट्रांसलेशन में एक भाषा में व्यक्त अर्थ (कथ्य) को दूसरी भाषा में व्यक्त करने की भाव है।

  • अनुवाद में जहां अर्थ के दोहराने का भाव निहित है वहीं ट्रांसलेशन में अर्थ को एक भाषा से दूसरी भाषा में ले जाने का संकेत मिलता है।




अनुवाद ओर translation का अर्थ(कोश गत)


Translation 

  • अंग्रेज़ी कोश के अनुसार, translation शब्द का सीधा अर्थ है - एक भाषा के पाठ/कथ्य को दूसरी भाषा में व्यक्त/रूपांतरण करना।

  • वेबस्टर डिक्शनरी के अनुसार, Translation is rendering from one language/ representational system into another. Translation is an art that involves the recreation of a work in another language for readers with a different background. ( एक भाषा से दूसरी भाषा में प्रस्तुतिकरण या प्रतिनिधित्व की प्रणाली अनुवाद है। यह ऐसी कला है जिसमें भिन्न पृष्ठभूमि वाले पाठकों के लिए किसी रचना का किसी ओर भाषा में पुन: सृजन होता है)

  • ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, Translation; the act/an instance of translating,a written or spoken word, speech, book in another language. (अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरण हैं (कथन, शब्द, पुस्तक)

  • लैक्सिकन यूनिवर्सल एनसाइक्लोपीडिया के अनुसार, translation theory refers to a general framework of principles and procedures that have been formulated(सूत्रबद्ध करना) to assist the translators.(


अनुवाद

शब्दार्थ चिंतामणि कोश के अनुसार, अनुवाद पहले से कहे गए अर्थ को पुनः कहना/ज्ञान अर्थ को प्रतिपादित करना है।


कलिका प्रसाद द्वारा संपादित "वृहद हिंदी कोश" के अनुसार, अनुवाद, फिर से उनके समर्थन रुप में कहना है।

भार्गव हिंदी शब्दकोश के अनुसार, अनुवाद का अर्थ - पुनुरूलेखन, दोहराव, अनुकरण, निंदा, भाषांतरण आदि हैं।






अनुवाद/ट्रांसलेशन का निहितार्थ या उद्देश्य/विशेषताओं 

  • एक भाषा में व्यक्त भाव, विचार,अर्थ, कथ्य, संदेश,बातों को दूसरी भाषा में ले जाना।

  • अनुवाद में कथ्य/संदेश अपरिवर्तनीय रहता है और केवल भाषा के स्तर में परिर्वतन होता है।

  • इसे दो भाषाओं के बिच संपन्न होने वाले कर्म भी कहा जाता है।

  • जिस भाषा में बात कही हुई है अथवा जिस भाषा से अनुवाद किया जाता है, उसे "स्त्रोत भाषा" (Source Language:SL) कहा जाता है

  • जिस भाषा में अनुवाद किया जाता है, उसे "लक्ष्य भाषा" (Target Language:TL) कहा जाता है।



अनुवाद/ट्रांसलेशन में आने वाली कठिनाइयां

  • एक भाषा से दूसरी भाषा में अंतरण की प्रक्रिया बहुत जटिल होती है। जटिलता का मुख्य करण: विशिष्ट भाषागत, सामाजिक, सांस्कृतिक, ओर शेलीगत होता है।

  • अनुवाद में कठिनाई का अन्य कारण, प्रत्येक भाषा की संरचना अपने आप में विशिष्ट होना है 

  • ध्वनि, शब्द,, अर्थ प्रसंग, उच्चारण, लय, वाक्य संरचना, मुहावरे लोकोक्तियों, अभिव्यक्ति आदि के संदर्भ में कोई भी दो भाषाएं समान नही होती है इसलिए अनुवाद करने में कठिनाई होती है।

  •  दो भाषाओं की समाजिक सांस्कृतिक सन्दर्भ का अलग अलग होना  ही अनुवाद करने में कठिनाई लाती है।

  • किसी तथ्य को व्यक्त करने की अंदाज़ में भी विभिन्न समाजों में अंतर देखे जा सकते हैं।

इसलिए एक भाषा में व्यक्त अर्थ और वैशिष्ठ्य को दूसरी भाषा में व्यक्त करना मुश्किल है। 

  • विभिन भाषा की वैशिष्ठिय को उद्धहरण द्वारा समझा जा सकता है;

हिंदी: कहो; कहिए, कहिएगा (अंग्रेज़ी: to say के प्रयोग से इनकी सूक्ष्मता को भर नही सकते हैं)


  • आज वह बहुत खुश हैं।

  • आज वह बेहद खुश है।

  • आज उसके ख़ुशी के मोर पैर ज़मीन पर नहीं टिक रहे।

  • आज वह खुशी में उड़ रहे है।






अनुवाद शब्द की विकाश यात्रा


संस्कृत में अनुवाद(वैदिक साहित्य व परवर्ती संस्कृत ग्रन्थ में): दोबारा कहने के अर्थ में 

  1. ऋग्वेद में जगदीश्वर को अनुवाद करने के करण "अनुवदति" कहा गया।

  2. ऐतारेय ब्रह्मण ग्रन्थ में अनुवाद के लिए " अनुब्रयाद/पुनः कथन" शब्द का प्रयोग किया गया है।

  3. न्याय दर्शन में अनुवाद को " अनुवाद वाक्य" कहा गया है।(फिर से कहना)

  4. शब्दार्थ चिंतामणि में अनुवाद को पुनः कहना बताया है।



भाष्य में: परवर्ती संस्कृत काल (लौकिक संस्कृत काल) में भाष्य, अनुवाद के पर्याय के रुप में प्रयोग किया जाता था। भाष्य में किसी मूल पाठ को पुनः स्पष्टता से व्यख्या किया गया है। ब्रह्मण ग्रंथों, वैदिक मंत्रों की भाष्य लिखी गई है 


टीका में: भाष्य की भांति मूल पाठ में स्पष्टता से व्याख्या करना। समान्यत; इसमें कलजयी संस्कृत ग्रंधों की टीका लिखी गई जेसे; कालीदास कृत " कुमारसंभवम" की, मलिकाकानाथ की आदि।



हिन्दी में  अनुवाद शब्द का प्रयोग/नाम 


प्राचीन साहित्यों में: टीका, भाषा बनाना


आदिकाल के बाद से: भाषा को भाखा


मुग़ल काल में: तजुर्बा/उल्था


भारतेन्दु युग में: सर्वप्रथम "हिन्दी में अनुवाद" शब्द का प्रयोग किया।


19 सदी तक आते आते: अनुवाद शब्द प्रचलित हो गया



हिंदीतर भाषाओं में अनुवाद शब्द के पर्याय/नाम 

अनुबाद: असमिया, बांग्ला, ओडिशा


अनुवदर/ अनुवादम: तेलुगु


तर्जुमा: उर्दू 


तरजमु: कश्मीरी भाषाओं में 


तर्जमो, अनुवाद, भाषांतर :सिंधी, गुजराती में 


कुल मिलाकर अनुवाद शब्द तो प्राचीन है, किंतु समय के साथ पहले की तुलना में इसके अर्थ में काफ़ी परिवर्तन आया है।







भाषा अनुवाद का अर्थ; किसी अन्य भाषा में कही गई बात को बोलचाल की प्रचलित भाषा में कहा ना ही भाषा अनुवाद कहलाता है।




अनुवाद बनाम रूपांतरण


1 भाषा का अंतरण होने की प्रक्रिया में भाषा परिवर्तित रूप लिए हुए नजर आती हैं इसलिए अनुवाद को कभी-कभी रूपांतरण भी कह दिया जाता है।


2 रूपांतरण और रूपांतर परस्पर समानार्थी शब्द है।


अनुवाद का मुख्य उद्देश्य मूल पाठ के यथा निकट भाव से मिलता जुलता पाठ का अंतरण किया जाना होता है वही रूपांतरण में कभी-कभी उसके भाव बदल भी सकते हैं इनमें यही मुख्य अन्तर है।


4 भाषा के अनुवाद में रूपांतरण उसका एक प्रकार है।


समग्र रूप से कहा जा सकता है कि अनुवाद और रूपांतरण दोनों का अपना अपना पृथक अस्तित्व होते हुए भी ये दोनों परस्पर सम्बन्धित है।




अनुवाद की परिभाषा


देश विदेश के अनेक अनुवाद चिंतकों विचारकों और अनुवादको ने अनुवाद का अर्थ स्पष्ट करने के लिए अपनी-अपनी दृष्टि से भिन्न भिन्न परिभाषाएं दी है जिनमें से कुछ प्रमुख चिंतकों की परिभाषाएं निम्नलिखित है:


विदेशी विचारक/चिंतक 


1 अनुवाद सिद्धांत शास्त्री यूजीन ए. नायडा ओर चार्ल्स तेबर: स्रोत भाषा में श्वेत संदेश के लिए लक्ष्य भाषा में निकटतम सहज संतुलित संदेश को प्रस्तुत करना ही अनुवाद है। (द थ्योरी एंड प्रैक्टिस ऑफ ट्रांसलेशन). इन्होंने लक्ष्य भाषा में दो चीजों को संतुलित करने पर बल दिया है - एक अर्थ और दूसरा शैली।


2 जे. सी. केटफर्ड:  एक भाषा की पाठ्य सामग्री को दूसरी भाषा  में प्रतिस्थापित करना ही अनुवाद है।( A linguistic theory of translation 1965) । ये भाषा के शिल्प पक्ष (रूपिम, शब्द संरचना,, पर बल)


3 पीटर न्यूमर्क: अनुवाद एक ऐसा कार्य है जिसमें एक भाषा में व्यक्त संदेश के स्थान पर दूसरी भाषा में उसी संदेश को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।


4 डा सैमुअल जानसन:  अनुवाद का आशय, अर्थ को बनाए रखते हुए उसे अन्य भाषा में अंतरित करना है। ( To translate is to change into another language retaining the sense)


5 ए. एच. स्मिथ:  यथासंभव अर्थ को बनाए रखते हुए अन्य भाषा में अंतरण करना ही अनुवाद है। ( To translate is to change into another language retaining as much as of the sense as one can)


भारतीय विचारक चिंतक 


1 प्रो. रविंद्रनाथ श्रीवास्तव: एक भाषा की पाठ्य सामग्री में अंतर्निहित तथ्य का समतुल्यता सिद्धांत के आधार पर दूसरी भाषा में संगठनात्मक रूपांतरण अथवा सृजनात्मक पुनर्गठन ही अनुवाद कहा जाता है।


2 डा नागेंद्र; निकटतम पर्याय शब्दावली और वाक्य विन्यास के द्वारा स्रोत भाषा के मूल पाठ को समग्र रूप से अर्थात उसके संपूर्ण प्रतिपाद्य विषय तथा रूपबंध आदि की यथासंभव रक्षा करते हुए लक्ष्य भाषा में प्रतिस्थापित करना ही अनुवाद है।


3 डा भोलानाथ तिवारी:  आर्दश अनुवाद वह है जो शब्दानुवाद तथा भावानुवाद दोनों पद्धतियों को यथावसर अपनाते हुए मूल मात्र के साथ-साथ यथाशक्ति मूल शैली को भी अपने में उतार लेता है और साथ ही लक्ष्य भाषा की सहज प्रकृति को भी अक्षुण बनाए रखता है।


4 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी:  भाव प्रदर्शन अनुवाद ही उत्तम अनुवाद है अर्थात शब्दों का प्रयोग तो केवल भाव प्रकट करने के लिए होता है।


5 आचार्य रामचंद्र शुक्ल: अनुवाद भाव प्रति भाव होना चाहिए स्रोत भाषा की छाया से लक्ष्य भाषा को यथासंभव बनाना चाहिए अनुवाद से संबद्ध शब्दों का प्रयोग होना चाहिए आवश्यकतानुसार मूल नियुक्त अनुवाद करना चाहिए।


6 डा हरिवंश राय बच्चन: अनुवाद की चरम सफलता यही मानी गई है कि वह अनुवाद ना मालूम होकर मौलिक रचना प्रतीत हो । जिस अनुपात में अनुवाद मौलिक प्रतीत होगा उसी अनुपात में उसे सफल माना जा सकता है।


7 सचिदानंद हिंरानंद वात्स्यान " अगैय" : समस्त अभिव्यक्ति अनुवाद ही है क्योंकि वह अव्यक्त को भाषा में प्रस्तुत करती हैं।


8 डा धर्मवीर भारती: मूल कृति और अनुवाद के बीच बहुत बड़ी दीवार हैं जिसे पृथक संस्कार पृथक काव्य रूढ़ियां प्रथम समूह आदि मेरे ख्याल में एक बीच का रास्ता निकालने की गुंजाइश है।


9 महादेवी वर्मा: भाषा भाषा विचारों और मनोभावों का परिधान है और इस दृष्टि से यह विचार किया कवि की उपलब्धियां जिस भाषा में व्यक्त हुई है उन्हें दूसरी वेशभूषा में लाना असंभव नहीं तो दुष्कर अवश्य आता है।


10 अमृता प्रीतम: अनुवाद तभी बेहतर होता है जब किसी भाषा के शब्द हमारे दिल में दस्तक देते हैं हमारे खून में मिलकर बहने लगते हैं हमारे दिल में धड़कनें लगते हैं।


निष्कर्ष;

अनुवाद को परिभाषित करने वाली उपयुक्त विभिन्न परिभाषाएं अनुवाद के अर्थ और स्वरूप को दर्शाने वाले विभिन्न पक्षों को स्पष्ट करती हैं कुछ विद्वानों ने अनुवाद के सामान्य स्वरूप को ध्यान में रखकर विचार व्यक्त किए तो कुछ ने विशेष स्वरुप को । लेकिन आज के संदर्भ में इतना तो स्पष्ट है कि एक भाषा के कथ्य को दूसरी भाषा में प्रस्तुत करना ही अनुवाद है । इसलिए उपर्युक्त परिभाषाओ के विवेचन विश्लेषण के आधार पर अनुवाद के संबंध में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं;(विशेषताओं)

  • द्विभाषिकता अनुवाद की न्यूनतम शर्त हैं।

  • अनुवाद वह भाषिक प्रक्रिया है जो दो भिन्न भाषाओं के बीच घटित होती हैं।

  • अनुवाद के माध्यम से एक भाषा में व्यक्त विचारों या संदेश को दूसरी भाषा में अभिव्यक्त किया जाता है।

  • यह  केवल संरचना के अर्थ के स्तर पर ही सीमित नहीं होती बल्कि संदर्भ के अर्थ और सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भों से संबंधित आर्थिक व्यापार भी होती हैं।

  • सार्थक पुनरुक्ति अनुवादक का मूल तत्व है।

  • अनुवाद में पूर्णता समान अभिव्यक्ति को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।

  • समान संदेश की अभिव्यक्ति के कारण स्रोत और लक्ष्य भाषा पाठ समनार्थी होते हैं।

  • अनुवाद में मूल के अर्थ के साथ साथ शैली को भी सुरक्षित रखा जाता है




अनुवाद के प्रकार / संदर्भ; तीन संदर्भ है


1 अंत: भाषिक अनुवाद; Intralingual Translation :

  • एक ही भाषा के अन्तर्गत होने वाला कार्य व्यापार

  • इसे अन्व्यांतर भी कहते हैं

  • इसमें अनुवादक किसी भाषा में कही हुई बात को, उसी भाषा में दूसरी तरह से कहता है।

  • जेसे प्राचीन भाषा में लिखी पुस्तकों का पुन प्रस्तुति,

  •  शैली, में बदलाव किया जा सकता है जैसे गद्य को पद्य में, पद्य को गद्य में

  • हिन्दी की औपचारिक शैली में लिखी सामग्री को बोलचाल की शैली में प्रस्तुति:  भोजपुरी,अवधि, खड़ी बोली आदि में


2 अंतर - भाषिक अनुवाद: Inter - lingual Translation

  • एक भाषा से दूसरी भाषा में व्यक्त करने को कहा जाता है

  • इसे भाषांतरण कहते हैं

  • जेसे हिन्दी से अंग्रेजी में

  • इसे अनुवाद के वास्तविक क्षेत्र माना गया है। इसलिए इसे वास्तविक अनुवाद (translation proper) भी कहा जाता है।

  • अनुवादक द्विभाषी हो, परम आवश्यक है।

  • इसमें अनुवादक समस्या से निजात पाने के लिए भावानुवाद, छायानुवाद, व्याख्या, अथवा पुनर्सृजन आदि का प्रयोग करते हैं।


3 अंतर -प्रतीकात्मक अनुवाद: ( Inter semiotic translation)

  • इसमें प्रतिको का प्रयोग किया जाता है

  • जेसे चौराहे पर रुकने के लिए लाल बत्ती का प्रयोग। एक प्रतीक है।

  • इसे प्रतिकांतरण भी कहा जाता है।

  • जैसे उपन्यास नाटक का फिल्माया जाना। सीरियल, फिल्म 




अनुवाद का सीमित सन्दर्भ/उद्वेश्य

:दो आयामों में अनुवाद सन्दर्भ को समझा जा सकता है


1)पाठधर्मी अनुवाद; स्रोत भाषा सामाग्री की लक्ष्य भाषा में प्रतिस्तथापना करना।

  • इसमें मूल पाठ का संप्रेष्य का आधार लिया जाता है और पाठ की संरचना और बनावट को ध्यान में रखा जाता है। अर्थात इसमें संरचना को समान रखने पर जोर दिया जाता है।

  • यह पाठ केंद्रित होता है।

  • इसमें अनुवादक को मूल पाठ से इतर बाहर जाने की छूट नहीं होती है।

  • इसके तहत मुख्य रूप से ज्ञानात्मक तथा सुचना प्रधान साहित्य का अनुवाद शामिल हैं। साथ ही मुहावरा, लोकोक्तियों आदि भी।

  • जेसे

    1. Cold war: शीत युद्ध

    2. Red tapism: लालफीताशाही

    3. Black money: काला धन

    4. White lie: सफ़ेद झूठ

    5. Cut throat behaviour: गला काट व्यवहार

    6. As long as there is life,there is hope: जब तक सांस तब तक आश

    7. To throw dust in eyes; आंखो में धूल झोंकना

2) प्रभावधर्मी अनुवाद 

  • इसमें पाठक पर प्रभाव को केन्द्र में रखकर अनुवाद किया जाता है

  • इसमें काव्यानुवाद, साहित्यानुवाद विषेश तौर पर आते हैं।

  • यहां अनुवादक को मूल पाठ से बाहर जाने की छूट होती है। वह पाठक पर मूलपाठ जैसा प्रभाव पैदा कराने के लिए ऐसा जरूर करता है।

  • ये अधिकांशत सृजनात्मक लेखन में उपयुक्त व कारगर होते हैं परन्तु ज्ञान प्रधान अथवा सुचना प्रधान में नही।




अनुवाद का महत्त्व और प्रासंगिकता


स्थिति; दो तरह के मत प्रचलित है:


एक वर्ग अनुवाद को मानव जीवन की अनिवार्यता मानते है और इसे मूल सामग्री के समान महत्त्व देते हैं।


दुसरा वर्ग अनुवाद को दोयम दर्जे की कृति मानती है। उनका कहना है कि यह किसी शीशी से दूसरी शीशी में पलटने जैसा है, इनका महत्त्व नहीं है।


पर पहली मत सार्वाधिक मान्य और तार्किक है क्योंकि आधुनिक युग में पाठकों की संख्या भी अधिक है और ज्ञान विज्ञान का भी तेजी से विकास सो इनका अन्य भाषाओं में अनुवाद अपरिहार्य है, जो समय, श्रम, पैसा सभी को बचाता है।



अनुवाद के स्वरूप लगातार बदल रहा है या ये कहे तो अधिक अच्छा होगा की अनुवाद का महत्त्व और प्रासंगिकता लगातार बढ़ रहा है. इसे निम्न आधार पर देख सकते हैं;


1 राष्ट्रिय एकता के रुप मे अनुवाद का महत्त्व

  • भौगोलिक सांस्कृतिक सामाजिक आर्थिक दृष्टि से हमारा देश बहुआयामी है। एक साथ कई धर्मों कई संप्रदायों कई जातियों कई भाषाओं और कई आचार व्यवहार के लोगों से मिलकर बना है।  हमारा देश भारत अनेक विचार परंपरा ज्ञान संपदा से मिलकर बना है। कई भाषा भाषी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बिखरे हुए हैं और इन सभी के बीच आपसी संबंध और एकता को बनाए रखने में अनुवाद का बड़ा महत्व है  एवं योगदान है। प्राचीन काल से लेकर आज तक कई लेखक लेखिकाओं ने अनुवाद कार्य के जरिए राष्ट्र एकता स्थापित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 जैसे बंगाल में कृति वास उड़ीसा में बलराम दास असम में संकरदेव मराठी में एकनाथ तमिल में कंभन मलयालम में एसुच्छादन, नेपाली में भानु दत्त कृष्ण भक्ति में सूरदास तेलुगु में पोट्टना गुजराती में नरसी मेहता बांग्ला में चांडीदास मलयालम में न्यू पुत्री कन्नड़ में कनकदास ओड़िया में जगन्नाथ दास।

हिंदी में प्रेमचंद्र शरद चंद्र जयशंकर प्रसाद सुब्रमण्यम भारती और छायावादी कवि हैं


2 समाजिक संस्कृति के विकास में अनुवाद का महत्त्व.

  • राष्ट्रीय स्तर पर स्वर अभिव्यक्ति की दिशादशा की जानकारी अनुवाद के बिना संभव ही नहीं क्योंकि भारत संस्कृति वाला देश है । 

मध्यकालीन पुनर्जागरण से लेकर 20 वीं सदी के नवजागरण तक आर्यन देशी-विदेशी संस्कृतियों कब भारत में विभिन्न यात्रियों का आगमन विभिन्न चिंतन परंपराओं का विकास संघर्ष यादी बहुआयामी संस्कृत परंपराओं और उपलब्धियों पर  विशेष योगदान रहा अनुवाद का।


3 भारतीय साहित्य के अध्ययन में अनुवाद

  • भारत आदिकाल से साहित्य सृजन मे अग्रणी रहा है और इन साहित्यों का सृजन किसी एक भाषा तक सीमित नहीं है इसलिए भारत जैसे इतने बड़े लोकतंत्र में सभी तक इनकी ज्ञान ज्योति को पहुंचाने में अनुवाद का बड़ा महत्वपूर्ण रोल है।

जैसे कि सूरदास से केवल इसकी पहचान नहीं हो सकती है इसके साथ गुजरात के नरसी मेहता तेलुगू की मौतअन्ना उड़ीसा के जगन्नाथ असम के संकरदेव कन्नड़ के पूर्ण दास बंगला के चंडीदास हिंदी में भी कई कृतियां लिखे हैं । इन तमाम लेखक लेखिकाओं की कृतियों एक दूसरी भाषाओं में बोलियों में अनुवाद के द्वारा ही इनकी सांस्कृतिक अदली बदली   है और समझने में भी आसान हुई है।


4 विश्व साहित्य के अध्ययन अध्यापन में अनुवाद का महत्त्व;

  • विश्व साहित्य  के अध्ययन अध्यापन में अनुवाद की आज के संदर्भ में  और भी प्राथमिकता  बढ़ गई है। 

 इसके इतिहास को देखें तो भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना के साथ ही भारत पश्चिमी चिंतन और चिंतकों और उनकी कृतियों के संपर्क में आई और उनकी कृतियों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद होने लगे हम उनसे परिचित हुए वह हमसे परिचित हुए और यह कई नैतिक वैज्ञानिक तकनीकी उपलब्धियां हमें उनसे सीखने को मिले और वह हमसे भी सीखे।

  •  उदाहरण के रूप में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1880 में विलियम शेक्सपियर के नाटक "मर्चेंट ऑफ वेनिस" का अनुवाद "दुर्लभ बंधु"  के रूप में किया, और तुलसीदास जी का अभिज्ञान शाकुंतलम् अंग्रेजी में भी अनुवाद हुआ इससे हम उनसे परिचित हुए और वे हमसे परिचित हो गए इसके अतिरिक्त एक दूसरे के ज्ञान संस्कृति तकनीकी का आदान-प्रदान भी हुआ।


5 तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन में अनुवाद का महत्त्व

  • अनुवाद तुलनात्मक अध्ययन की आधारभूत धूरी है । अनुवाद के सहारे ही एक भाषा को जानने वाले अन्य भाषा की साहित्यिक उपलब्धियों से परिचित होते हैं । अनुवाद की सुविधा ना होती तो हिंदी भाषी लोग शरद चंद्र, तुकाराम , अकबर इलाहाबादी, केवी पुत्तप्पा  आदि भारतीय रचनाकारों से ही परिचित नहीं होते तो फिर विदेशी से कैसे?

  • इस अनुवाद प्रक्रिया से, सूरदास और नरसी मेहता, phanishwar nath Renu aur sati nath Bhaduri, महादेवी वर्मा और बाल मनी अम्मा, हिंदी और कन्नड़ भक्ति आंदोलन, Hindi aur Anish Kshetra upnyason में संबंध कैसे पाता चलता?

  • तुलनातमक अनुशीलन ओं से विभिन्न भाषा भाषियों का अहम और घमंड भी टूटता है कि उनकी भाषा का साहित्य ही सबसे श्रेष्ठ है और वे सच्चाई को स्वीकारते हैं। उससे सीखकर और सर्वश्रेष्ठ कृतियां बनाने के लिए प्रेरित होते हैं अतः तुलनात्मक अध्ययन अध्यापन में अनुवाद की आज के समय में प्रासंगिकता और भी बढ़ गई क्योंकि खोजी तकनीकी को पुन; अनुसंधान करने में बुद्धिमानी नहीं बल्कि उससे सीखकर आगे की खोज करना सफल आविष्कार मानी जाती है।


6 व्यवसाय के क्षेत्र में अनुवाद का महत्त्व; 

  • व्यवसाय क्षेत्र में अनुवाद का महत्व आज से नहीं है  अपितु प्राचीन काल में भी द्विभाषिये का प्रचलन था और आज भी है । आज तो कही  और  अधिक  इसकी व्यापकता देखने को मिलता है ।

जैसे भारत में ही देख लीजिए हर विभाग में अनुवादक का एक विशिष्ट पद सृजित किया गया है । विभिन्न मंत्री गणों के लिए उनकी ट्रांसलेटर साथ में रहते हैं जब भी वे किसी दूसरे भाषी क्षेत्र में  या विदेश में यात्रा करते हैं।

  • चूंकि दो लोगों के बीच उनके व्यवसाय उनकी आपसी संवाद पर ही निर्भर करती है और उनकी संवाद तभी संभव है जब उन्हें कही गई बातें उसी गर्मजोशी  तत्काल समझ में आए और इसके लिए अनुवादक की आवश्यकता होती है। अत: अनुवाद्क का महत्व व्यवसाय क्षेत्र में भी देखा जा सकता है।


7 पर्यटन के क्षेत्र में अनुवाद का महत्त्व:

  • पर्यटन  को अब उद्योग भी मानने लगा है । L पर्यटन का संबंध राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय दोनों क्षेत्रों से होता है।  इसमें यात्रा आवास मनोरंजन मार्गदर्शन तथा पर्यटन स्थल संबंधित सूचना का आदान-प्रदान आदि शामिल होते हैं और इस क्षेत्र में अनुवाद का चाहे लिखित हो या मौखिक आवश्यकता एवं उपयोगिता अनिवार्य हो गई है क्योंकि पर्यटक बहुत दूर से भी हो सकते हैं और नजदीक से भी और निवासी भी हो सकते है और विदेशी भी ऐसी स्थिति में उन्हें गाइड की आवश्यकता होती है। पथ प्रदर्शक की आवश्यकता होती है चाहे वह पुस्तकों से हो अखबारों से हो या सूचनाओं से हो उन्हें एक भाषा में छपी दूसरी भाषा में जानने के लिए अनुवादक का सहारा लेना ही पड़ता है और इसके लिए इंटरनेट गूगल ट्रांसलेटर वॉइस ट्रांसलेटर आदि अत्याधुनिक सुविधाओं का भी इस्तेमाल करते हैं।


8 प्राशासनिक क्षेत्र में अनुवाद का महत्त्व

  • प्रशासनिक क्षेत्रों में अनुवाद प्रमुख रूप से अंग्रेजी से हिंदी में होता है आवश्यकतानुसार थोड़ा बहुत अनुवाद हिंदी से अंग्रेजी में होता है।

  • स्वतंत्र भारत की प्रशासन व्यवस्था ब्रिटिश राज्य से मिली। चूंकि यहां पर अंग्रेजी में बनाए प्रशासनिक व्यवस्था ही प्रचलित थी और सारे अधिकारी और कर्मचारी वर्ग अंग्रेजी में ही काम करने को अभ्यस्त हो गए थे । स्वतन्त्रता के बाद हिंदी को राजभाषा घोषित करने के बावजूद अंग्रेजी को भी राजभाषा के रूप में रखा गया इतना ही नहीं अंग्रेजी को आज भी अनवरत भारत में प्रशासनिक क्षेत्रों में धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है । निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में हिंदी और अंग्रेजी प्रमुख प्रशासनिक भाषा के रूप में अपना योगदान दे रहे हैं इसलिए अनुवाद इनके बीच सर्वाधिक होता है इसी तरह भाषाओं का भी राज्य स्तर पर अनुवाद की आवश्यकता पड़ती है।


9 जनसंचार माध्यमों में अनुवाद का महत्त्व

  • 21वीं सदी की इस माया नगरी में पत्रकारिता विज्ञापन आकाशवाणी दूरदर्शन चलचित्र कंप्यूटर कृतिम उपग्रह मोबाइल फोन लैपटॉप नवीनतम संचार तकनीकों ने मनुष्य को सूचनाओं से अधिक से अधिक लेस कर दिया है। इन संचार माध्यमों ने संपूर्ण विश्व को एक दूसरे के निकट लाकर खड़ा कर दिया  है जिसके चलते अनुवाद प्रणाली अपरिहार्य हो गया है हालांकि इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का धड़ल्ले से उपयोग होता है और एक भाषा से दूसरी भाषा तक संवाद वार्तालाप भी सेकंडो में हो जाता है जैसे गूगल ट्रांसलेटर वॉइस ट्रांसलेटर आदि।


10 शिक्षा के क्षैत्र में अनुवाद का महत्त्व:

  • अनुवाद का महत्व हर क्षेत्र में है ही लेकिन शिक्षा में बहुत अधिक क्योंकि सारी विद्या शिक्षा के अंदर ही अंतर्निहित है।

 किसी को प्राचीन ग्रंथों से ज्ञान अर्जित करने हो तो यह जरूरी नहीं है कि उन्हें उन भाषाओं की ज्ञान होना आवश्यक क्योंकि कई अनुवादको ने इन्हें वर्तमान संदर्भ में  कई भाषाओं में मूल पाठ जैसा ही अनुवाद कर दिया है । साथ ही विदेशी भाषाओं के रचनाओं को भी भारतीय भाषाओं में अनुदित किया है।  कई भारतीय भाषाओं की पुस्तकों को भी विश्व के अन्य भाषाओं में अनूदित किया गया है जिनका समुचित लाभ शिक्षक शिक्षार्थी परीक्षार्थी सभी को हो रहा है।  अतः कहा जा सकता है कि शिक्षा के क्षेत्र में भी अनुवाद का महत्त्व उतने ही प्रासंगिक है जितने अन्य क्षेत्रों में।





अनुवाद की चुनौतिया


अनुवाद की चुनौतियों से तात्पर्य अनुवाद के दौरान एक अनुवादक के सामने आने वाली समस्याओं से है जिनसे उन्हें जूझने पढ़ते हैं. अनुवादक को केवल 2 भाषाओं की चुनौती नहीं रहती उनके समक्ष दो संस्कृतियों की , दो संदर्भों की , दो विभिन्न परिवेशओं की सभ्यता गत संस्कृति गत चुनौतियां  भी रहती है जिनसे उबरना कठिन कार्य है।


अनुवाद की चुनौतियों के विभिन्न स्तर हो सकते हैं जैसे;



1 विषय वस्तु के आधार पर, अनुवादक या अनुवादी  को विभिन्न विषयों एवम विज्ञान के साथ-साथ मूल कृतियों के भाव को समझने की पहली चुनौती होती है।

  • कई बार अनुवादक को सामग्री के अनुरूप लक्ष्य भाषा में शब्द नहीं मिल पाते हैं तब उन्हें समस्या उत्पन्न होती है।

  • समाधान: ऐसी स्थिति में अनुवादक मूल कृति की मूल भाव को समझ कर शब्दों का प्रयोग करते हैं 

जैसे: कृष्णा सोबती के उपन्यास "मित्रो मरजानी"का अंग्रेजी अनुवाद "To hell with you Mitro" नाम से हुआ है इसमें स्त्री के मनोभाव को आधार बनाकर अनुवाद करके विषयगत समस्याओं से निजात पाने का प्रयास किया गया है।

  • महाश्वेता देवी की कहनी " स्तनदायनी" का अंग्रेज़ी अनुवाद " The Breast Giver" नाम से किया है। इसमें भी स्त्री मनोभाव, शब्द को अनुकूल वातावरण में पिरोते हुवे स्त्री दैहिक शौषण को उजागर किया गया है।

2 समाजिक सांस्कृतिक परिवेश के स्तर पर;

  • 1990 के बाद,

3 अभिवयक्ति के स्तर पर: अभिधा, लक्षणा, व्यंजना

  • ज्ञानपरक समग्री में अभिधा महत्वपूर्ण हो जाती हैं तो सर्जनात्मक साहित्यों में अभिधा को लेकर छूट मिल सकता है। 

  • परिभाषिक सब्दो की पर्याय भी नहीं मिलना समस्या है

  • समाधान: मूल शब्द का लिपियंत्रण कर देना।जेसे हिन्दी को Hindi,



4 शैली के स्तर पर,

  • काव्य ग्रंथों के अनुवाद में यह समस्या आती हैं क्योंकि विशिष्ट, छंद, लय दूसरे भाषा में हो जरूरी नहीं।

  • इसके समाधान मे वे पुनः सृजन करते हैं 

5 अनुवाद्यता(untranslatability)





अनुवाद की सीमाएं और अनुनुवाद्यता(untranslatability)


कोई भी अनुवाद पूर्ण हो यह तय करना कठिन कार्य है क्योंकि किसी भी स्रोत भाषा के पाठ का न तो आदर्श अनुवाद हो पाता है और ना ही वह अन अनुवाद रहता है। इन्ही समस्याओं को अनुवाद की सीमाएं कहा जाता है तथा अगर पाठ या शब्द अनुदित हो सकने योग्य हो तो उसे अनुवाद्य (translatability) कहते हैं और अनुवाद संभव नहीं हो तो उसे अन - अनुवद्ध्य/अनानुवाद्यता कहते हैं।


ब्रिटिश विद्वान कैटफोड़ ने अनुवाद की दो प्रकार की सीमाएं बताई है 

  • पहली,भाषा की प्रकृति 

  • दूसरी, सामाजिक सांस्कृतिक

पोपोविच के अनुसार, स्रोत भाषा  और लक्ष्य भाषा की भिन्न संरचनाओं के कारण भाषा परख सीमा का हल तो निकल सकता है किंतु सामाजिक सांस्कृतिक सीमाएं इतनी जटिल होती है कि वह भाषाई संरचनाओं के साथ गुथी होती है।


कृष्ण कुमार गोस्वामी ने इन दोनों सीमाओं के अतिरिक्त तीसरी सीमा भी बताई है;

  • तीसरी,पाठ प्राकृतिपरक 


#भाषा की प्रकृति के स्तर पर अनुवाद की समस्या :

  • विशिष्ट संरचना गत विभीनता के कारण जैसे: 

*Ram killed Ravana.: 

Sub  _ verb  _ Obj


राम ने रावण को मारा

कर्ता _ कर्म _ क्रिया


    अर्थात वाक्य विन्यास में विभिन्नता की समस्या उत्पन्न होती है।


*Rohit worked very hard.

Sub_verb_adv _verb


रोहित बहुत मेहनत करता है।

कर्ता _क्रिया विशेषण _क्रिया


अर्थात्, अंग्रेज़ी वाक्यों में क्रिया विशेषण का प्रयोग verb के बाद होता है जबकि हिन्दी वाक्यों में क्रिया के पहले।


  • अर्थ गत समस्या जेसे


"मीरा नाचने वाली है " का दो अर्थ निकल सकता है;

  • मीरा अब नाचने वाली है।

  • मीरा नाचने का काम करती है।


"पीते जाओ" का तीन अर्थ निकल सकता है

  • पीते हुए जाओ।

  • पीने के बाद जाओ।

  • पीते ही रहो।

अतः बाह्य संरचना से जो वाक्य सरल प्रतीत होते हैं उनकी आंतरिक संरचना एकाधिक हो सकती है। जो अनुवाद के सम्मुख भी आती हैं जिनका समाधान सन्दर्भ के अनुसार किया जाना होता है।


  • लिंग(gender): अंग्रेजी में gender की अभिव्यक्ति नही हुआ होता है जबकि हिन्दी में होता है जैसे;


लड़का आ गया: Boy has come.

लड़की आ गई: Girl has come.


  • हिंदी में आदर्शवादक बहुवचन(बिंदु) का प्रयोग होता है जबकि अंग्रेजी में नहीं। जैसे


She is very good speaker.

वह बहुत अच्छी वक्ता हैं।


  • हिन्दी में जिस अंश पर बल देना हो उसे समान्यत; शुरु में रखा जाता है। जैसे


मैंने कहा था न कि वह नही आयेगा।


  • कई बार कई वाक्यों के एक ही अंग्रेज़ी अनुवाद होता है जैसे


उसकी बीबी बुखार से पीड़ित हैं।

उसकी पत्नी को बुखार है।

उसकी बेगम की तबियत नासाज है।

उसकी पत्नि ज्वार ग्रस्त है।

His wife is suffering from fever.


#सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भों का अनुवाद ओर सीमाएं 


कई धार्मिक सांस्कृतिक सामाजिक नामों का लक्षित भाषाओं में सामग्री मिलना असंभव होता है क्योंकि अगर इनका जबरदस्ती अनुवाद किया भी जाय तो इनमे मूलभाव लुप्त होने का खतरा रहता है सो इन्हे उसी रूप में लिपियांत्रण करना ठीक माना गया है जैसे;


"रामायण"के मूल नामों पात्रों को उसी नाम में प्रयोग

यूरोपीय भोजन: पिज्जा, बर्गर आदि का उस भाषा में लिपियांत्रण किया जाता है।


त्योहारों के नाम, रितिरिवाज, का हु ब हू अनुवाद


लोकोक्ति मुहावरों का अनुवाद(भावानुवाद)/समुचित टिप्प्णी करके समाधान करना।

  • It is his herculean task.

यहां "Herculean" हिंदी भाषी के लिए अपरिचित शब्द है यह एक व्यक्ति का नाम है जो अपने काम में सिद्ध हुआ था अतः हिंदी में इसके स्थान पर हिंदी के सिद्ध पुरुष "भागीरथ " का प्रयोग करना होगा।


उसका भागीरथी प्रयास है।


  • Barking dogs seldom bite.

जो गरजते हैं वे बरसते नहीं।

  • Every potter praises his own pot.

अपनी दही को कोन खट्टा कहता है।

  • It is a cock and bull story

यह बे सिर पैर की बात है।

  • श्री गणेश करना, हाथ पीले करना, आदि का शब्दानुवाद या भावानुवाद संभव नहीं होने पर थोडी टिप्प्णी व्याख्या करनी पड़ सकती है।




अनुवाद: अनुसृजन, पुनर्लेखन, नवलेखन


चुकी, सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद तुलनात्मक रूप से अधिक जटिल है। महत्वपूर्ण कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट के अनुसार – " Poetry is what gets lost in translation "  अर्थात अनुवादकी प्रक्रिया मे छूट जाता है वही कविता है।


साहित्य समाज का दर्पण होता है। यानी समाज में जो घटित होता है, साहित्य उसका आइना होता है। 


प्रेमचंद ने तो इससे बढ़कर साहित्य को महत्त्व देते हुए कहा कि – साहित्य समाज का दर्पण मात्र नही अपितु वह समाज के विकास के लिए उसका मार्ग प्रशस्त करने का कार्य भी करता है। अत समाज को समझने और उसे आगे ले जानें के लिए साहित्यों का अध्ययन आवश्यक है और यह अध्यान व्यापक तौर पर तभी संभव है जब किसी भाषा में लिखी श्रेष्ठ सामग्री का अन्य भाषाओं में भी श्रेष्ठ अनुवाद हो।


"साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल है" __  प्रेमचंद





ऐसा सबलोग इसलिए मानते है क्योंकि साहित्य और समाज एक दूसरे की पूरक हैं।


अनुसृजन; "अनुसृजन" शब्द अनु+सृजन के योग से बना है जिसमें अनु का अर्थ होता है – बाद में तथा सृजन का अर्थ है – रचना। इस प्रकार अनुसृजन का तात्पर्य है – मूल रचना के पश्चात उसकी पुनर्रचना करना। अर्थात समान्य अनुवाद से परे सृजनात्मक शैली में किया गया अनुवाद।

  • अनुवाद में हू ब हू दूसरी भाषा में लिपियांतरण करना होता है वहीं अनुसृजन में अपने से भी कुछ जोड़ने, छटने की छूट रहती है।

  • भारतीय साहित्यों का अनुसृजन बड़े पैमाने पर हुआ है विशेषकर "रामकथाए" एवं " कृष्णकाव्य" ।

  • इसमें रचनाकारों अपने समाज संस्कृती, आदि के भाव को ध्यान में रखकर अनुकूलित अनुवाद करता है/ अनुसृजन करता है।


अनुसृजन के महत्त्व/ उपयोगिता


  • सर्जनात्मक साहित्यों का काम केवल सुचना प्रदान करना नही होता है अपितु तत्कालीन समय में विभिन्न परिवर्तनों को भी दिखाना होता है।

  • पाठक को वर्तमान सन्दर्भ से जोड़कर कृतियों को पेश करना होता है।

  • वर्तमान शैली में, भाषाओं में पेश करके पाठको को अध्यन में आसान किया जाता है।

  • जैसे वाल्मीकि रामायण का अनुसृजन लगातार चलता रहा है

    • रामचत्रितमानस: तुलसी

    • कांभ रामायण

    • कृति वास रामायण

    • रामावतारम (तमिल)

    • रंगनाथ रामायणम( तेलगु)

    • साकेत (हिंदू)

    • इसके अलावा म्यामार, बर्मा, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कंबोडिया, मंगोलिया, आदि एशियाई देशों में रामकथा प्रचलित है।

    • महाभारत की भी अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद, रूपांतरण देखने को मिलता है।

इस प्रकार, सृजनतमक साहित्य में मूल पाठ के हु हु ब हू अनुवाद के स्थान पर  अनुवाद मे रचना को आत्मसात करते हुए पुनर्सृजन की छूट होती है जिससे  रचना न केवल बेहतर होती है बल्कि लक्ष्यभाषा के पाठको के मानस को अधिक गहराई से छूती है।

उदाहरण स्वरुप;

उमर खैयाम की रूबाइयों का अनुवाद, अनुवाद न होकर अनुसृजन  है।

इसके अलावा विभिन्न कवियों __ मैथलीशरण गुप्त, हरिवंशराय बच्चन, श्रीधर पाठक आदि ने भी कई पुनर्सृजन किए है।


कुल मिलाकर, इसमें अनुवादक अनुवाद प्रक्रिया के दौरान पाठ की प्रकृति तथा अनुवाद के उद्देश्य व उसकी प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुवे थोडी छूट भी ले सकता है। यह छूट मूल पाठ के कथ्य अथवा शेली किसी भी पक्ष में हो सकती है।





पुनर्लेखन

अनुसृजन की तरह अनुवाद को पुनर्लेखन भी कहते हैं।


पुनर्लेखन को अंग्रेजी में rewriting कहते हैं जिसका अर्थ होता है – फिर से लिखना।


भक्तिकाल के दौरान भारत में प्रचुर मात्रा में अनुवाद कार्य हुआ है जिसकी सिधांतिकी परंपरा से भिन्न दिखाई देते हैं। 


सुचित मुखर्जी के शब्दों में — 


" What we don't have in India is a theory or theories of translation. This may be because,as I said at the outset,we have been practising translation for so many years –  so many centuries, in fact – that we forgot to stop and theories.

(Sujit Mukharjee)


पुनर्सृजन से तात्पर्य है – मूल पाठ से केवल प्रेरणा लेना और फिर उसे अपने समय, समाज, संस्कृति की आवश्यकता, आदि के अनुसार पुनर्सृजन/ अनुसृजन/अनुलेखन/पुनर्लेखन कर देना


भारतीय भाषाओं में इन रचनाओं और रचनाकारों को मूल पाठ के सामान सम्मान और इज्ज़त प्राप्त है।


अंग्रेजी लेखक आंद्रे लेफेवेयर के अनुसार,

  • Book: " Translation, rewriting,and the manipulation of literary fame"

  • Rewriting is manipulation, undertaken in the service of power,and in its positive aspect can help in the evolution of a literature and a society. Rewritings can introduce new concepts,new genres,new devices,and the history of translation is the history also of literary innovation,of the shaping power of one culture upon another

इस प्रकार स्पष्ट है कि अनुवाद के माध्यम से किसी रचना को किसी अन्य भाषा एवं संस्कृति में किंचित परिवर्तनों के साथ जब स्थापित किया जाता है तो उसे पुनर्लेखन कहा जाता है जहां वह रचना अर्थ मूल से भिन्न होता है। इसे कोई छेड़छाड़ कहते है तो कोई मेनुपुलेशन (लेफेवेयर)



नवलेखण


सर्जनात्मक साहित्य के अनुवाद के सन्दर्भ में प्रयोग होने वाला एक अन्य शब्द है – नवलेखन। यह अनुवाद का ही अभिन्न रूप है।


सुजित मुखर्जी: अपनी पुस्तक " Translation as Discovery" में अनुवाद को नवलेखन कहकर पुकारा है।

" This is particularly so eno literary culture like ours where the presence of many languages enables a text to pass from one language to another without any sense of special achievement.

"


स्पष्ट है की अनुवाद के विभिन्न रूपों की निर्मिति में अनुवाद की बृहद परंपरा तथा सैद्धांतिकी की बड़ी भुमिका है। अनुवाद को नवलेखन कहने ओर समझने के मूल में पाठ का सृजनात्मक अनुवाद ही है। जिसकी परंपरा मध्यकालीन भारतीय साहित्यों में देखी जा सकती है।






अनुवाद की भारतीय परंपरा



विद्वानों की राय में अनुवाद चिंतन की प्राचीन परंपरा भारत में अनुप्लबाध बताई जाती है। पर सच तो यह है कि भारत में अनुवाद की एक लम्बी परम्परा रही है जो प्राचीन काल में ही शुरु हो जाता है।


दुनिया भर में उपलब्ध ज्ञान की सभी शाखाओं की नई जानकारियों का अनुवाद करने की बजाय भारत के चिंतक उन्हे आत्मसात कर मौलिक पद्धति से भारतीय संस्कार के साथ प्रस्तुत करना बेहतर समझे हैं।


हालांकि प्राचीन काल में भारतीय चिंतकों की जीवन पद्धति पाश्चात्य विद्वानों की तरह अपने करतबों के व्यवस्थित सैद्धांतिकरण की नही थी।

यही करण से पश्चिमी अनुवादकों व परंपरा को अधिक सुव्यवस्थित बताई जाती है।


भारत में अनुवाद कार्य वेदों की रचना के बाद से शुरु हो गई थीं। जिसे

  • ब्राह्मण

  • अरण्यक

  • निघंटू

  • निरुक्त उसी का उद्धरण है।

हालांकि प्राचीन में अधिकांश अनुवाद कर्म मौखिक रूप में मिलती थीं जैसे गुरू शिष्य शिक्षण ग्रहण में। उसके बाद टीका टिप्पणी, भाषा टीका ग्रंथ उन्हे परंपरा की देन है।


संस्कृत नाटकों में नायक का संवाद संस्कृत में होती थीं, स्त्री एवं सेविका की बात प्राकृत (लोकभाषा) में। इस प्रकार वार्तालाप आदि में अनुवाद का कार्य तब भी हो ही रहा था।



उत्रवैदिक काल आते आते विभिन्न जनपदों का स्वरुप स्थिर होती गई । तब उनका अन्य राज्यों से बातचीत के लिए दुभाषिया हुआ करता था। अत अनुवाद कार्य के वर्तमान स्वरुप की और वे बढ़ रहे थे।



जैसे हम जानते है ऋग्वेद को पढ़ने वाले को होत्री/सोत्री कहा जाता था इसका सीधा सा अर्थ है उस समय ये लोक कथाओं में था एक पीठी से दूसरे पीढ़ी में किस्सा कथाओं से आता होगा जो कालांतर में विभिन्न आचार्यों द्वारा टीका टिप्पणी करके एक स्थिर रूप दिया गया जिसे आज के शब्दो में अनुवाद का ही एक रूप कहा जा सकता है।

अत भारत में अनुवाद परंपरा सदा से बनी रही।



यह अनुवाद परम्परा 9 वीं सदी तक आते आते और अधिक स्थिर और ज्ञानात्मक होता गया। उन्ही कड़ियों में

  • पंच तंत्र

  • अर्थशास्त्र

  • हितुपदेश

  • युगसूत्र

  • रामायण

  • महाभारत

  • भगवतगीता आदि का अनुवाद अरबी में होने लगे

भक्तिकाल (14 वीं सदी)। के दौरान संस्कृत पाठों का आम जनमानस में व्यापक स्तर पर पहुंच रही थी। बड़े पैमाने पर भाष्यो की रचनाएं हो रहे थे । तब के भाष्य आज के अनुवाद के विभिन्न रूपों नवलेखन, पुनर्सृजन आदि में रखा जा सकता है।


मराठी कवि ज्ञानेश्वर ने गीता का अनुवाद किए, इसी तरह अन्य संत कवियों ने रामायण और महाभारत का अनुवाद किया।


पमपा, कम्बन, मौला, तुलसी, प्रेमानंद, एकनाथ, बलराम दास, माधव कंडाली, ओर कृतिदास आदि द्वारा किए गए रामायण का रूपांतरण विशेष महत्व रखता हे ।






मुगलकालीन अनुवाद परम्परा


मुगल काल में मस्जिदों में " मकतब" की व्यवस्तथा की गई। जिसमें बच्चे प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करते थे। इस काल में शिक्षा पर काफ़ी काम किया गया जेसे;

  • शुहारते आम विभाग: स्कूल कॉलेज निर्माण विभाग (बाबर)

  • दिल्ली में पुस्तकालय,

  • हुमायू ने एक भारतीय शैली " सबक ए हिन्दी" विकसित करवाया।

  • अकबर ने गुजरात जितने पर एक अनुवाद विभाग की स्थापना करवाया।। फतेहपुर सीकरी शिक्षा का केन्द्र बना ( फारसी साहित्य का पुनर्जागरण का काल) नो रत्न।

    • राज कवि: अबुल फेजी

    • अमीर खुसरो

    • अब्बास खान ने "तोहफ़ा ए अकबर शाही की रचना" जिसमें शेरशाह सूरी के बारे में बताया गया है इसके लिए अनुवाद का भरपूर इस्तेमाल किया गया है।

  • दाराशिकोह " धार्मिक भावनाओं, इन्होंने फारसी में अनुवाद करवाया 

    • गीता

    • उपनिषद

    • रामायण


  • "मजमा उल बेहतरीन"में वेदांत और सूफीवाद के शास्त्रीय शब्दो का तुलनातांक अध्यायन प्रस्तुत है।


  • मुगल काल में राजकुमारियों, रानियां, उच्च घराने की लड़कियां भी शिक्षा ग्रहण करती थीं जैसे

    • गुलबदन बेगम (बाबर की बेटी)

    • कवियत्री शालिमा सुलतान ( हुमायु की भतीजी)

    • नूरजहां

    • मुमताजमहल

    • जहां आरा

    • जेबबुनिसा

    • दुर्गावती

    • चांदबीबी

    • अकबर की मां पुराने किले में" खेर दल मंजिल" नामक मदरसा भी चलाती थी।

संस्कृत से अरबी अनुवाद केन्द्र


9 वीं सदी में, 

  • खलीफा अब्दुल रहमान lll ने कोरडोबा (स्पेन) एक बड़ा पुस्तकालय खोलवाया ओर अनुवाद कार्य भी।

  • सिसली के शासकों ने

  • स्पेन, सीरिया, दामिसक, आदि में आर्यभट की कृतियों का अनुवाद हुआ।


पंच तंत्र का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद

  • विष्णु शर्मा के पच तंत्र का पहले संस्कृत से फारसी फिर अरबी में इब्न बटुता ने (कलिका/डिमिना)किया।




हिंदुस्तानी पाठ का फारसी अनुवाद परम्परा

मध्यकालीन भारत (12 - 18 वीं सदी) 

  • विष्णु शर्मा: पंचतंत्र "  पहलवी भाषा में , फिर फारसी में ( कलीला व दमीना) अन्य यूरोपीय भाषाओं में फ्रांस की क्रांति में इस पुस्तक की बड़ी भुमिका है

  • मन कातुहाल (संस्कृत) का फारसी में अनुवाद

  • अरंगजेब के समय "संगीत दर्पण"(संस्कृत) का  फारसी अनुवाद

  • मुगल काल में रामायण महाभारत का फारसी अनुवाद

  • अकबर के समय में तुलसी सूर आदि संत कवियों की कृतियों का फारसी अनुवाद

अरबी ग्रंथो का भारतीय भाषाओं में अनुवाद

  • कुरान का सर्वप्रथाम अनुवाद दिल्ली के शाह रफुद्दीन (17 - 18 सदी) 

  • इसके बाद देहलवी ने,(मुदहे उल कुरान)

  • हेडिसो का अनुवाद




उपनिवेशकालीन भारतीय अनुवाद परम्परा


अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के लिए जैसे तैसे अनुवाद कार्य शुरु किए । उस समय तीन प्रकार के अनुवाद कार्य हुवे

  • अंग्रेजी ग्रंथो का भारतीय भाषाओं में

  • संस्कृत ग्रंथों का भारतीय भाषाओं में

  • आधुनिक भारतीय भाषाओं की रचनाओं का परस्पर अनुवाद

इनमे हिन्दी अनुवाद सार्वाधिक प्रचलित रहा जिसमें राष्ट्रवादी रूप प्रबल रूप से थे।

In राष्ट्रवादी स्वरुप लेखकों में प्रमुख थे:

  • हिन्दी नवजागरण के लेखक: भारतेंदु, हरिश्चंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, के अनुवाद


भारतेंदु ने संस्कृत के पांच, बंगला के एक, अंग्रेजी के एक नाटकों का अनुवाद किया।


महावीर प्रसाद द्विवेदी ने, जान स्टुअर्ट मिल की पुस्तक "लिबर्टी" का "स्वाधीनता" नाम से अनुवाद किया (1907- 21) 


रामचंद्र शुक्ल ने जर्मन वैज्ञानिक अनसर्ट हैकल की पुस्तक" रीडिल ऑफ यूनिवर्स" का "विश्व प्रपंच" नाम से अनुवाद किया।


प्रेमचंद ने भी अपने ही लिखी कई उर्दू रचानौ का हिन्दी में अनुवाद किए जेसे " बाजरे हुस्न" का हिन्दी में अनुवाद किया।


सखाराम गणेश देवुष्कार की पुस्तक " देशेर कथा" का हिन्दी में अनुवाद हुआ।

 जिसने राष्ट्रिय चेतना का विकास किया।



विलियम जोन्स ने कालीदास कृत " अभिज्ञान शकुंतलम" का अंग्रेजी अनुवाद किया।


इस प्रकार भारतीए अनुवादकों ने अंग्रेजी में अनुवाद करने वाली पाठों का विस्तार करने, सुधारने, शंशोधन कराने में अपनी अहम भूमिका निभाई। कभी कभी ब्रिटिश व्याखाया की चुनौती भी दिए, हालांकि पूरा विवाद समकालीन पाठों की बजाय प्राचीन पाठों पर ही होता था।




आधुनिक भारतीय अनुवाद सिद्धांत

भारत में शुरू से ही अनुवाद की कोई ठोस 

ओर मानकीकृत अनुवादकी नही हुआ है। यह प्रथा लगभग प्राचीन अनुवाद परंपरा से आधुनिक भारत के रचनाकारों तक भी लागु होती है। हालांकि भूमंडलीकरण से प्राभावित होकर स्वतंत्र भारत में ऐसे कई आधुनिक भारतीय अनुवादक हुए जिन्होंने अनुवाद सिद्धांत को लेकर अपनी स्पष्ट राय और नियम दिए, जिन्हे आधुनिक भारतीय सिद्धांत नाम दिया जा सकता है।


भारत के प्रमुख अनुवाद सिद्धांत और सिद्धांतकार


1 ए के रामानुजन का अनुवाद सिद्धांत

ये कवि, विचारक, के साथ साथ एक अच्छे अनुवादक भी थे। अंग्रेजी और कन्नड़ में रचनाएं किए। 

प्रमुख कृतियां

Poems of love and war

The collected essays of ak ramanujan




अनुवाद को लेकर रामानुजन का मत है कि एक अनुवादक को मूल पाठ की रक्षा करते हुए अनुवाद करनी चाहिए। साथ में अनुवाद कार्य में दोहरी जिम्मेदारी अनुवादक पर होने पर जोर दिया क्योंकि अनुवाद में अनुवादक के मुखर व्यक्तित्व की बात करते हैं।


2 सुजित मुखर्जी का अनुवाद सिद्धांत

मुखर्जी जी भारतीय अनुवाद अध्ययन के आधुनिक परिपेक्ष्य को महत्वपूर्ण दिशा देने मे अपने विशिष्ट योगदान के लिए जाने जाते हैं। वे एक अध्यापक, आलोचक, संपादक के साथ साथ अच्छे अनुवादक भी थे।


वे अनुवाद को नवलेखन (new writing)  के रूप में प्रस्तावित करते हैं तथा अनुवाद को खोज मानते हैं और उसे समुस्थान (recovery) , खोज (discovery) एवं नवलेखन(new writing) की संज्ञा से अभिहित करते हैं।


इनके लेखन और अनुवाद कार्य की विशेषता यह है कि वह भक्ति साहित्य रामायण के विभिन्न अनुवाद, तमिल दरबारी साहित्य, लोककथाओं एवं जनश्रुतियों के व्यापक परिपेक्ष्य में अभिव्यक्ति मिलती हैं।



उन्होंने अनुवादक को तार्किक होकर अनुवाद करने पर जोर दिया है अर्थात अनुवाद पुनर्कथन जैसा हो जहां थोड़ी अनुवादक को अपनी ओर से कटने, छटने और व्याख्या करने की छूट होती है परंतु ये छूट भाष्यकार जेसी नही होता।


उन्होंने अपने विभिन्न निबंधों यथा " Translation as Testimony" में वाल्टर बेजामिन द्वारा उठाई बहस की अनुवाद में सत्यता कितनी हो को स्पष्ट किया है। वहीं "Translation as perjury" में रविंद्र नाथ टैगोर की रचना गीतांजलि के अनुवाद को falsification न कहकर Perjury बताया है।

साथ ही" translation as patriotism " निबंध में वे अनुवाद को देशभक्तिपूर्ण कार्य बताया है। 


निष्कर्ष: इस प्रकार हम कह सकते है कि सुजित मुखर्जी के सैद्धांतिक विवेचन का महत्व तो है ही उनके व्यवहारिक अनुवाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।



3 गायत्री चक्रवर्ती स्पीवक का अनुवाद सिद्धांत


ये तुलनातमक साहित्य, आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय कार्यों के लिए जानी जाती हैं।


वे कई निबंधों और अनुवाद के द्वारा अनुवाद सिद्धांत का विवेचन प्रस्तुत की हैं। "Politics of transition" में उन्होंने कहा है कि अनुवाद एक सुनियोजित राजनीति और रणनीति होती है उसमे कहीं अलग से बताने की अवश्यकता नहीं कि अनुवादक का लिंग (gender) क्या है।

साथ में वह अनुवाद को आवाश्यक किंतु असंभव कार्य मानती है। वह अनुवाद को एक पाठ मानती है जिसे पाठक के रूप में अनुवादक की भूमिका को रेखांकित करती है।


प्रमुख अनुवाद

  • महाश्वेता देवी की रचना " स्तंदायिनी" का Breast Giver " नाम से


4 हरीश त्रिवेदी का अनुवाद सिद्धांत

दिल्ली विश्विद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर रहे त्रिवेदी जी समकालीन भारतीय अनुवाद के विमर्श को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उत्तर उपनिवेशिक अनुवाद पर विवेचन अत्यंत मूल्यवान है। व्यवहारिक अनुवाद के क्षेत्र में हस्त है।


वे अनुवाद में शब्दों के  ढीले ढाले अर्थ के प्रयोग के खिलाप थे

अनुवाद:

  • कोलोनियल ट्रांसलेशन: इंग्लिश लिट्रेचर एंड इंडिया,



5 तेजस्विनी निरंजना 

निरंजना जी अनुवाद को भाषिक कार्य ( linguistic exercise) से बहुत आगे ले जाकर एक व्यापक राजनीतिक सांस्कृतिक कार्य के रूप में परिभाषित करती हैं।


उन्होंने अनुवाद में ब्रिटिश, कोलोनियल ट्रांसलेशन की मानसिकता को लेकर अपनी राय बताई है हालांकि कोई अलग से सिद्धांत नही दीं।



प्राचीन पाश्चात्य अनुवाद सिद्दांत


 अधिकांश पश्चिमी चिंतक मानते है की प्राचीन पाश्चात्य अनुवाद परंपरा रोम से शुरु हुई है। इसके पहले यह शासकों के अन्तर्गत बाइबल के दिशानिर्देशों से  अनुवाद होता था। फिर कालांतर में कई अनुवादकों ने अपनी अपनी राय अथवा विचार रखे जिसमे वायक्लिफ के बाइबल अनुवाद में , पाठ 15 में अनुवाद के चार चरणों की बात कही गई है इसका उल्लेख करना समीचीन होगा:(14 वि सदी)

  • पुरानी बाईबल संग्रह, टिप्पणियों ओर एक आधिकारिक लेटिन स्रोत पाठ सुनिश्चित करने में एक सामूहिक प्रयास है ।

  • विभिन्न संस्करणों की तुलना

  • पुराने वायाकारणिक और प्राचीन देवीकिन ओर शब्दों व जटिल अर्थों के साथ तालमेल

  • वाक्यों का यथासंभव अनुवाद, साथ ही सतर्कता से अनुवाद की जांच।




15 वीं सदी में पाश्चात्य अनुवाद:

इस समय यूरोप में कुछ अनुवादकों ने कुछ अनुवाद के सिद्धांत बनाए परन्तु उसे प्रोपर सिध्दांत नहीं कहा जा सकता हैं क्योंकि सिद्धांत तत्कालीन प्रचलित प्रणालियों में परिवर्तन के कारक होते हैं, चाहे वह साहित्यिक हो अथवा अनुवाद सिद्धांत। हालांकि छापेखाने के अविष्कार से अनुवाद के क्षेत्र में तेजी अवश्य आए।




16 वीं सदी में पाश्चात्य अनुवाद सिद्धांत

फ्रांसिसी मानवतावादी अतिन डाले को प्रथम अनुवाद सिध्दांत का प्रवर्तक माना जाता है । उन्होने एक फ्रांसीसी लेख में बताया कि " एक भाषा से दूसरी भाषा में ठीक से केसे अनुवाद करें"  यहां पर उन्होंने पांच सिंदधनात दिए जो इस प्रकार है:

  1. अनुवाद को मूल लेखक का अर्थ और अभिप्राय पूरी तरह से समझना चाहिए, यध्यपि वह अष्पाष्टताओं को स्पष्टत करने के लिए स्वतंत्र है।

  2. अनुवादक को स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा, दोनों का पूर्ण ज्ञान होना चाहीए

  3. अनुवादक को अक्षरत: अनुवाद (नही ) करने से बचना चाहिए।

  4. अनुवदक को सामान्य भाषा का प्रयोग करना चाहिए।

  5. अनुवादकों को शब्दों का उपयुक्त चयन करना चाहिए।

इस तरह उन्होंने मूल पाठ को महत्त्व दिया है। साथ ही वे शाब्दिक अनुवाद से भी बचने को सलाह दिया है। अर्थात् अनुवादाक को मध्यम मार्ग प्रशस्त किया है।






 परवर्ती अनुवाद्क जॉर्ज चेपमेन (16वीं) ने होमर का अंग्रेज़ी अनुवाद किया। उन्होंने अपनी पुस्तक " The seven  Books " 1558   कहा है कि 

  • अनुवाद एक कुशल और योग्य अनुवादक का कार्य है।

  • अनुवादक को मूल लेखक के वाक्यों और रचना विन्यासो तथा व्याकारणों का सुक्ष्म पड़ताल करना चाहिए। साथ ही उसके मूल आशय और संभनाओ को समझे 

  • मुहावरे यदि का इस्तेमाल लक्ष्य भाषा के अनुकूल होनी चाहीए




17 वीं शतावादी

इस समय इंग्लैंड के जॉन ड्राडेन प्रसिद्ध अनुवादक थे। जिन्होंने अनुवाद सिद्धांत देते हुवे कहा कि:

  • अक्षरत: अनुवाद (metaphrase) या एक लेखक का शब्द्स ओर पंक्ति एक भाषा से दूसरे भाषा में अनुवाद

  • विस्तृत व्याख्या: paraphrase भाव का दृष्टिकोण

  • अनुकरण: imitation: जहां पर अनुवादक उपयुक्तता के आधार पर मूल विषय को त्याग सकता है।

  • वे अनुवाद्क को एक चित्रकार मानते है।




18 वीं सदी


सैमुअल जानसन ने अनुवाद कार्य में इच्छित अनुवाद पर जोर दिया। उन्होंने अनुवाद परिचर्चा को अनुवाद की स्वतंत्रता के प्रशन से दूर किया।


अलेक्जेंडर फ्रेजर टिटलर ने  अनुवाद पर " अनुवाद सिद्धांत" principles of  translation  लिखी जहां अनुवाद के तीन प्रमुख सिद्धांतो की चर्चा की है:

  • अनुवाद को मूल कार्य के दृष्टिकोण को पूरी तरह से व्यक्त करना चाहिए।

  • लिखने का आचरण और रीति मूल के चरित्र जैसा होना चाहिए।

  • अनुवाद में मूल साहित्य रचना की समस्त सरलताए होनी चाहीए।


19 वीं सदी

A w शेलेगल (जर्मन) ने अनुवाद के विषय में यह आकलन किया कि

  • समस्त कार्य बोलना और लिखना अनुवाद के ही कार्य है। क्योंकि संचरण की यह प्रवृत्ति होती है कि वह मूल के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए प्राप्त सुचना को प्रकाशित करती अथवा समझती है। उदाहरण स्वरुप जब उन्होने dante ka अनुवाद किया तब उन्होने भी डांटे के Terza rima को बनाए रखा।

F w fitzgerald ने  बताया कि 

  • "एक विषय को किसी भी कीमत पर रहना चाहिए किसी के बदतर जीवन को स्थानांतरित करने के साथ कोई मूल को अच्छे से नही रख सकता "  

  • अर्थात उन्होने लाक्षणिक अर्थों में बताया की मेरे जीवित कुत्ता शेर से बेहतर है । जो है वही ठीक। स्वतंत्रापुरक अनुवाद पर जोर दिया।







अनुवाद के मध्यकालीन पश्चिम सिद्धान्त


अनुवाद की अनिवार्यता प्राचीन काल से रही है । अलग अलग भाषाओं , जातियों, समाजों आदि को संपर्क साधने के लिए इसकी जरूरत भी थी और इसी संपर्क की क्रिया ने इसमें आमूल चूल परिवर्तन और विकास भी किया । आज की अनुवाद का रूप, एक लम्बी परम्परा का परिणाम है जिसमें पाश्चात्य अनुवाद परम्परा का उतना ही महत्त्व है जीतना किसी अन्य भाषाओं का।


अनुवाद के प्रारम्भिक रूप मिश्र, सुमेर, बेबीलोन, हित्ती साम्रज्यो जेसी विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में ढूंढे गए हैं।


इनके बाद आती है यूनानी सभ्याता, जिसमे अनुवाद की  मान्यताएं अपेक्षाकृत कम थी जबकि रोम में उतने ही अधीक। उदहारण स्वरूप ईसाइयों के धर्मग्रंथ " बाईबल" के अनुवाद को लेकर।


पश्चिमी देशों में जो अनुवाद परम्परा विकसित हो रही थी उसे ही पश्चात् अनुवाद परंपरा कहा जाता है। इनमे कुछ प्रमुख हैं:

  • प्राचीन सुमेर में अनुवाद

    • वर्तमान ईराक जिसे विश्व की प्राचीनतम सभ्यता मानी जाती है वहां 6000 BC में  अनुवाद एक विकसित विद्या थी तथा एक पेशा के रुप में प्रचलित थी।

    • किलाक्षर लिपि में, राजभाषा ओर लोक भाषा के रुप में  अक्केडी - सुमेरी " प्रचलित थी।

    • अनुवादकों के लिए यहां विद्यालय की व्यवस्था थी।

  • बेबीलोन में अनुवाद

    • आज के बग़दाद और इराक

    • हम्मूराबी के शासन के दौरान"बेबिलोनी " भाषा में सुमेरी भाषा से अनुवाद किए गए।

  • हित्ती साम्राज्य में अनुवाद

    • 1800 BC ke बाद

    • भारोपीय परिवार की भाषा " हित्ती"  में भी अनुवाद कोष" सुमेरी अक्कड़ी हित्ती शब्दकोश " 

  • प्राचीन मिश्र में अनुवाद

    • 18 वी BC के आस पास

    • किलाक्षारी लिपि में "आधुनिक "केडर" शब्द उन्ही की देन।

    • सबसे पूराना अनुवादक " आंखुरमेस" था जो शासक टिनिस का पुजारी था।

  • प्राचीन यूनान में अनुवाद

    • 6 00 bc में कम हुआ परन्तु उसके बाद आमूल चूल परिवर्तन नहीं huva pesa ke rup me मान्यता प्राप्त नहीं हो पाया कभी

  • प्राचीन रोम में अनुवाद

    • रोम ग्रीक से लैटिन में अनुवाद कार्य खूब किए

    • जिसके संस्थापक: लिवियस एडेरेनुकास को माना जाता है

    • इसके बाद टेरेंस, बेथियास,

संत जेराम, के जन्म दिन 30 sept को "अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

  • एंड्रोनिकास ने होमर के महाकाव्य" ओड़िसी " (Odyssey)  का अनुवाद, वहां इसे मौलिक रूप में रोमन वासियों के परिवेशों के अनुकूल रूपांतरण किया गया जैसे भारतीयों ने किया था।

प्राचीन रोम में अनुवाद सिद्धान्त पर बहस:

  • 200 BC आते आते शुरु हो गए थे।

  • यह बहस मुख्यत शाब्दिक और स्वच्छंद अनुवाद को लेकर थी जो उस समय की व्यवहारिक समस्या भी थी।

इन प्रमुख रोमन सिद्धांतकारों में 

  • मार्कुस तुलियास सिसरो (100 BC) वक्त, दार्शनिक, नेता,: सूक्तियों के लिऐ प्रसिद्ध,

Ex: 1) It is the nature of every person to error,but the only the fool preserves in error

( गलती किसी से भी हो सकती है पर मूर्ख बार बार गलती करता है)

2) The more laws, the less justice

( जितने ज्यादा कानून उतने कम न्याय)


3) A home without books  is a body without soul

(  पुस्तक विहीन घर वैसा ही है जैसा आत्मरहित शरीर) 





मध्यकालीन पश्चिम: अवधि और वर्गीकरण 


पश्चिम का मध्यकाल मुख्यत यूरोप का मध्यकाल है। इसकी अवधि 5 00 AD से 1500 AD तक मानी जाती  है।


यहां अनुवाद कार्य रोमन साम्राज्य के पतन और पुनर्जागरण की शुरुवात से मानी जाती है।( कास्तुन्तुनिया का पतन)


बेल्जियन इतिहासकार हेनरी और डच इतिहासकार जॉन ने इस मध्यकाल को तीन भागों में बाटा है;

  1. प्रारम्भिक मध्य काल: 476 Ad से 1000 ad

  2. मध्य मध्य काल: 1000 ad से 1300 ad

  3. अंतिम मध्यकाल: 13 00 ad से 1453 तक

इस समय अनुवाद का कार्य उतने प्रबल न होने के कारण  मध्यकाल को अकादमिक स्तर से पश्चिम का अंधकार युग माना जाता है, क्योंकि उस दौर में:

  • बौद्धिक सृजन का आभाव था

  • समाजिक, राजनितिक,धार्मिक अराजकता की स्थितियां फैली हुई थीं।

  • राजनितिक, सामाजिक और धार्मिक स्वतंत्रता का सर्वधा आभाव था।

  • जनजातीय आक्रमण में तेज़ी आई थीं।

  • प्रारम्भिक मध्यकाल की घटनाओं की संपूर्ण जानकारी की आभाव थी।

  • आमजीवन पर चर्च का वर्चस्व बना हुआ था।

  • सोच मुख्यत प्रकृतिवाद से प्रेरित थी।

  • धार्मिक मदांधता छाई हुई थीं।

हालांकि एडवर्ट ग्रांट जैसे कुछ इतिहासकार केवल प्रारम्भिक दौर को ही अंधकार युग की संज्ञा देना समीचीन समझते हैं। इनका कहना हैं कि " if revolutionary rational thoughts were expressed in the age of reason (the 18th  century ) they were only made possible because of the long  mediaeval tradition that established the use of reasons as one of the activities" 


मध्यकालीन पश्चिम में अनुवाद का योगदान

  • अनुवाद: समाजिक, राजनितिक, परिस्थितियों की उपज: 

  • अनुवाद की अकादमिक मान्यता (12 ad ke बाद)

  • अनुवाद को राजकीय प्रश्रय; चालर्स, अल्फर्ड,ने इसके राष्ट्रिय मान्यता दी। इसके विकास केलिए प्रयाप्त कार्य किए v व्यवस्था किया।

  • अनुवाद; राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान: राष्ट्रिय भासाओ से क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद अथवा vice versa से उन्हे पहचान की दायरा बड़ी।

  • अनुवाद: भाषा के विकास में सहायक: इस काल में अंग्रेजी, स्पेनिश, फ्रेंच, स्वीडिश, जर्मन आदि के विकास में अनुवाद का महत्त्व सबसे ज्यादा है।

  • अनुवाद: लिपि के विकास में सहायक: मध्यकाल के प्रवेश द्वार तक गोथिक लिपि (मौखिक)  लिखित भाषा की ओर तेजी से बढ़ी इसमें उफीला ने अरमाई लिपि के विकास करके आमूल चूल परिवर्तन किया। किससे अनुवाद कार्य खूब फली।

  • अनुवाद: धार्मिक कट्टरता का परिचायक बना: मध्यकाल में अनुवाद को प्रोत्साहित, प्रायोजित, प्राधिकृत, अधिकृत, ओर संवर्धित करने में कैथोलिक चर्च की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। हालांकि तब यह लेटिन से लैटिन तक ही सीमित थी पर बाद में जन जन तक पहुंचाने में कई अन्य भाषाओ तक फैला।

  • अनुवाद: धार्मिक कट्टरता से उन्मुक्ति का साधन: जो अनुवाद धार्मिक कट्टरता को बढ़ाया उन्ही ने मध्यकाल के अन्तिम दौर में धार्मिक कट्टरता से उन्मुक्ति के साधन के रूप में काम किया। जेसे बाइबल का अनुवाद अन्य भाषाओं में 

  • अनुवाद: ज्ञान की धरोहर को संरक्षित करने में सहायक: अंधकार युग के दौरान पश्चिम ज्ञान को अनुवाद के माध्यम से अरबी में संरक्षित किया जा सका। जेसे चिकित्सा, अलजेब्रा, दशमलव, आदि। इसी झाईं को छटनी का कार्य किया पुनर्जागरण काल ने जिसमे असंख्य अनुवाद किया गया।

  • अनुवाद: एक सामाजिक आवश्यकता:  आरंभिक मध्यकाल में लैटिन का क्षैत्र सीमित होने लगा था, आम आदमी से इसका वास्ता समाप्त प्राय होने लगा तभी  मध्यकल में क्षेत्रिय भाषाओं को  अनुवाद के लिए नई शक्ती और अवसर मिली।

फोलोना ने मध्यकालीन अनुवाद को दो भागों में बाटकर स्पष्ट किया है:

  • क्षेतिज: मूल भाषा से क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद जेसे लैटिन से अन्य भाषाओं में

  • रैखिक: दो सामान सम्मान प्राप्त भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद जैसे इतालवी और फ्रेंच के बीच अनुवाद।

  • अनुवाद: भूत और वर्तमान को एक सूत्र में बांधने में सहायक।

  • अनुवाद: पुनर्जगरण की आधारभूमि: विश्वविद्यालयों को स्थापना, बौद्धिक संपदा की पुनः खोज, 

  • अनुवाद कार्य का आधुनिकीकरण:

    • प्रिटिंग प्रेस का आविष्कार

    • पहला अनुवाद बाइबल की छपाई, न्यू टेस्टामेंट (1525 ad) me छपाई

    • हिंब्रू पेटांग (1482) छपाई

    • हिब्रू बाइबल की छपाई

    • मार्टिन लूथर किंग का जर्मन बाइबलकी छपाई 1550


  • कई अनुवाद के केंद्रों की स्थापना

    • बगदाद अनुवाद केन्द्र: इराक में यहां प्राचीन ग्रीक लेटिन एवं अन्य भाषाओ में उपलव्ध वैज्ञानिक और दार्शनिक ग्रंथों का अरबी में अनुवाद किया जाता था।

      • टोलेडो अनुवाद केन्द्र: यहूदी, कांवर्स, मोजराब प्रकार के अनुवादक : यहां पर तीन प्रकार के अनुवादक थे जो क्रमश; यहूदियों के लिए, ईसाइयों के लिऐ,ओर इस्लामों के अधीन हैं ईसाई होते थे


  • अनुवाद: विज्ञान के विकास में सहायक:  अल खवाजमी की गणितीय सिद्धांत: की पुस्तक " न्यूमरो इनोदोरम" जिसका लेटिन में अनुवाद के कारण हो सुरक्षित रह सका।


  • पुनर्जागरण काल के इतालवी दार्शनिक ब्रूनो के अनुसार: From translation all science has its offspring ( विज्ञान की सभी सन्तितियां अनुवाद से विकसित हुई है)


हेनरी के अनुसार; translation was key to  scientific progress as it unlocked for each successive inventor and discovered the mind of predecessors who expressed their innovative thoughts in another language।

अत कहा जा सकता है की विज्ञान के विकास में अनुवाद की भूमिका सराहनीय और स्मरणीय है। फिर मेडिकल के क्षेत्र में हो या फिर एस्ट्रोलोजी के क्षेत्र में  या अन्य किसी में भी।



  • अनुवादकों की प्रतिष्ठा: स्पेन के शासक अलफांसो एक्स ने अनुवादकों के लिए पुरस्कार की व्यवस्था की। इसी तर्ज पर 14 वीं सदी में फ्रांस के शासक चार्ल्स v ने लैटिन से फ्रेंच में करने के लिऐ अनुवादकों को आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाया।

  • अनुवाद: धार्मिक, भाषायी, सहिष्णुता और बहु भाषिता का परिचायक: तमाम धार्मिक राष्ट्रिय और भाषाई कटुता के बावजूद अनुवाद ने सभी में मेल जोल स्थापित किया है। ईसाई और इस्लाम के बीस स्थापित तालमेल इसका प्रबल उदाहरण हैं।

    • 13 वीं सदी में"  किताब अल्मीराज" का अनुवाद लैटिन, फ्रेंच और कस्तलियान में कराया गया।

    • 12 वीं सदी में रॉबर्ट ऑफ चेस्टर ने कुरान का अनुवाद लैटिन में किया।


मध्यकालीन पश्चिम में अनुवाद की प्रवृत्तियां ( विशेषताएं)

  • मध्यकालीन पश्चिम में अनुवाद की दो परस्पर विरोधाभास प्रविृतिया देखने को मिलती है;

    • क्लासिक भाषाओं को लोकप्रियता में वृध्दि

    • स्थानीय भाषाओं के प्रति नैतिक जिम्मेदारी में बढ़ोतरी

बाईबल कहानियों का अनुवाद गद्यातामक ओर पद्यतामक प्रतिच्छिवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है खास कर ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट के तुलनातमक अधिमिश्रण को कायम रखने के लिऐ।



मध्यकालीन पश्चातय अनुवाद सिद्धान्त


स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि अनुवाद सिद्धान्त की दृष्टि से पश्चिम का मध्यकाल उतना उम्दा नही दिखता है, जितना की अनुवाद व्यवहार की दृष्टि से।


प्रारम्भिक और मध्यकालीन पश्चिम में अनुवाद सिद्धान्त पर गंभीर चिंतन का सर्वथा अभाव रहा है। यह भी कहा जा सकता है मध्यकाल में अनुवाद सिद्धान्त स्वभावत; विकसित ही नहीं हुआ था। हालांकि कुछ अनुवादकों ने अनुवाद कार्य अवश्य किया पर संकुचित क्षेत्रों में।


अनुवाद सिद्धान्त को क्षेत्र, राष्ट्र, भाषा, ओर धर्म विशेष के नज़रिए से समझना अधिक बेहतर होगा। इसे इस प्रकार समझते है:

  • रोमन और ग्रीक


अनुवाद सिद्धांत के क्षेत्र में रोमन को अग्रणी बनाने का कार्य 

संत जेराम (345 ad) ने किया।

वे एक चर्च में फादर, अनुवादक, इतिहासकार,और तर्कप्रेमी रहे। वे पश्चिम के पहले व्यवस्थित अनुवादक और अनुकाद सिद्धांकार थे। उनका सर्व प्रमुख देन " बाइबल का लैटिन" में  " बुलगेत" शीर्षक से अनुवाद  हैll

इनका मानना था

  • कि संतोषजनक अनुवाद करना एक कठिन कार्य है ।

  •  उनके अनुवाद का विरोध भी हुआ, क्योंकि उन्होंने अनुवाद में नवीनता लाने की कोशिश की। इसलिए उन्हे धर्म विरोधी कहा कहा गया।  और रूढ़िवादियों की नाराज़गी झेलनी पड़ी।

  • इन्होंने अनुवाद में शब्दानुवाद की जगह भावानुवाद को अधिक महत्त्व दिया। ताकि जो कथ्य है उसे समझने में आम आदमी को दिक्कत नही हो।

  • उन्होंने ये भी कहा कि " Not translated word for word in my Translation of Greek texts,but sense for sense, except in the case of the scriptures in which even the order.

अतः कहा जा सकता है की रोम ने अनुवाद कार्य और सिद्धान्त की संगठित परंपरा की नीव डाली।


बेथियुस (480 ad) ने शब्दानुवाद पर बल दिए इन्होंने अरस्तू और प्लेटु की दार्शनिक बातों का अनुवाद करने की बीड़ा उठाई थी। साथ ही वे जेराम के अनुवाद सिद्धान्त से भी बहुत प्रभावित था।


बुलगेत  ने जेराम को अनुवाद सिद्धांत के एक मॉडल के रूप में स्वीकार किया।


केसीडोरस ( 480 ad) ने विवरियाण की स्थापना की जिसका लक्ष्य था ग्रीक के दर्शानिको एक धार्मिकों के ग्रंथो का अनुवाद किया। यह एक अध्ययन और अनुवाद केन्द्र था।


9 सदी में रेवेना मुख्यता चर्च सम्बंधी अनुवाद ग्रंथो से संबन्धित रहा।



Dante अलीगियारी (12 00 AD)

एक महान कवि, अनुवादक, चिंतक थे जिनका मानना था कि

  • अनुवाद उचित और प्रभावकारी नही हो सकता है। क्योंकि हर भाषा का काव्य उसके लय सिद्धांतो के अनुरूप रचा जाता है।

  • उनका यह भी मानना था कि अनुवाद से मूल रचना की लय और मधुरता आदि नष्ट हो जाते हैं।

  • उन्होंने कहा " Anything harmonised through the bond of the transmuted from its idiom into another without losing all its sweetness and harmony " 

  • उन्होंने अनुवाद कार्य में नैतिकता और सौंदर्य को महत्वपूर्ण माना।

  • उन्होंने अनुवाद की सहजता और स्पष्टता और विशेष बल दिया।

  • कुल मिलाकर उनका कहना था की अनुवाद शैली की तुलनाओ से बढ़कर है।


रोजर बेकन (13 सदी)

 वे महान गणितज्ञ, वैज्ञानिक,ओर अविस्कारक थे। साथ ही उनकी अनुवाद में भी गहरी रुचि थी वे  यूरोपीय पुनर्जागरण की पहली कड़ी थे।


  • वे क्लासिक भाषाओं और स्थानीय भाषाओं के अनुवाद को समझते थे। इसलिए अनुवाद कार्य की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा किए

  • उन्होंने अनुनाद कार्य को दो भागों में बाटा

    • शिष्टता और : यहां अनुवादक को अधिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती,

    • अशिष्टता: प्रतिष्ठित स्रोत भाषा से अप्रतिष्ठित लक्ष्य भाषा में अनुवाद करना 

  • अनुवाद कार्य में अनुवादक की विशिष्ठ योग्यता की अपेक्षा होती है।


लियोनार्दो बुरनी ( 14 वी सदी)

एक इतालवी मानवतावादी अनुवादक

होमर और प्लेटो के ग्रंथो का अनुवाद किया

इन्होंने अपनी रचना " ई रेक्टा" में श्रेष्ठ अनुवादक के गुणों की चर्चा की है । उनके अनुसार,

  • अनुवादक को मूल भाषा और लक्ष्य भाषा का प्रामाणिक ज्ञान होना चाहिए।

  • व्यकाराणिक ओर शाब्दिक ज्ञान के साथ साथ शैलीगत सरंचनाओ का सुक्ष्म बोध होना चाहिए।

  • हालांकि उनकी अनुवाद सम्बंधी सिद्धान्त मुख्यता  ग्रीक से लैटिन अनुवाद पर टिका है। 

  • इनका सिद्धनत नई पीढ़ियों विशेषकर पुनर्जागरण काल के अनुवादकों के लिए मार्गदर्शक रहा।


एतिन दोले (16 वी सदी)

फ्रेंच कवि, अनुवादक, प्रकाशक और मानवतावादी थे। ये लूथर किंग के समकालीन थे। इन्हे प्रथम व्यवस्थित अनुवाद सिद्धांतकार माना जाता है।

इनके मानवतावादी कार्यों के करण इन्हे तत्कालीन पोपो का कोपभाजन बनना पड़ा, इन्हे मृत्यु दण्ड दिया गया। परन्तु इनके द्वारा जो अनुवाद सम्बंधी सिद्धान्त दिए गए उनमें पांच बातों पर बल दिया गया है:

  1. अनुवादक को स्रोत भाषा का उच्चस्तरीय ज्ञान और लेखक की अभिप्रेरणाओ को समझने की क्षमता होनी चाहिए। अर्थात लेखन के प्रयोजन समझना जरूरी है।

  2. अनुवादक को अनुवाद कार्य आम भाषा में करनी चाहिए ताकि आम लोग इसको ठीक से समझ सके

  3. स्रोत भाषा के साथ ही लक्ष्य भाषा का भी अनुवादक को प्रयाप्त ज्ञान होना चाहिए

  4. मूल के प्रति निष्ठावान होनी चहिए अर्थात मूल संदेश को हर संभव रक्षा होनी चहिए।

  5. उत्कृष्ट अनुवाद वही है जो सही और सहज समझ पैदा कर सके।

कुल मिलाकर इन्होंने अपने अनुवाद सिद्धान्त में , अनुवाद कार्य में सहजता और मूल तत्व की रक्षा पर बल दिया है।


अल्फर्ड

ब्रिटेन के वेसेक्स के कुशल शासक थे । इन्होंने खुद भी अनुवाद किया और करवाया भी। इन्होंने लेटिन से अंग्रेजी में अनुवाद किया। इनके अनुसार,

  • वे अनुवाद को सांस्कृतिक अवनति के निदान का महत्वपूर्ण साधन मानते थे।

  • उन्होंने शब्दानुवाद ओर मुक्तानुवाद दोनों पर बल दिया।

  • सहज और सरल भाषा के प्रयोग अनुवाद में हो, समर्थन किया।

  • वे अनुवाद को राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीयता का प्रतीक मानते थे।

जे ए hemartan ने उनके लिए कहा भी है " Alfred the great was a translator himself and the cause of translation in others (1986)



जान वैकालिफ (14 वी सदी)

अंग्रेजी में बाइबल का पूरा अनुवाद 

इन्होंने किया । ये मातृभाषा में अनुवाद हो के समर्थक थे जिसके करण वे कैथोलिक चर्च के विरोधी समझे गए । इनके शिष्यों या अनुयायियों को लोलार्ड कहा गया। इनके एक शिष्य जान पूर्वे ने अनुवाद को लेकर चार चरणों को परिभाषित किया जो इस प्रकार है:

  • अनुवाद की प्रमाणिकता सिद्ध करने की सामूहिक जिम्मेदारी

  • मूल और लक्ष्य का तुलनातमक अध्ययन

  • पुराने और जानकार व्यकारणविदो से कठिन शब्दों और अर्थों के संबंध में जानकारी हासिल करना।

  • अर्थ और वाक्य का अनुवाद होना चाहैये। शब्दानुवाद अनुचित हो सकता है। अत; सामुदायिक स्तर पर अनुवाद को  अभिप्रमाणित करना चाहिए।

इसके अलावा उन्होंने अनुवाद के अर्थ पर विशेष ध्यान देने की बात कही।


स्पेन निवासी अलफांसो डी: ने अनुवाद में शब्दानुवाद संभव नही है, इसलिए अनुवादक को टीका, टिप्प्णी, विश्लेषण, ग्लोस देना चाहिए। साथ ही इन्होंने सारे अनुवाद कार्य को दो भागों में रखा

  • मुक्त प्राय और शब्दानुवाद


जर्मन अनुवादक वान इव, एक मानवतावादी, ने अनुवाद की प्रयोगिकता ओर संप्रेषणीयता पर ज़ोर दिया।





जर्मन के मार्टिन लूथर किंग,(15वि सदी)

इक धर्मशास्त्री, विचारक, तर्क प्रेमी, ओर अनुवादक थे वे मूर्ति पूजा और चर्च के विरोधी थे। इनके अनुसर अनुवाद कार्य ऐसे हो जहां

अनुवाद में सरलता,सहजता, प्रयोग ओर बोधगमायता की प्रयाप्त गुंजाइश हो।

उन्होंने अनुवाद को सामाजिक राजनितिक और धार्मिक विमुक्तियों ओर उन्मुक्तियो को आधार बनाया।

अनुवाद की सुग्यम्यता के लिए निम्न बातों पर विशेष बल दिया:

  • क्रम परिर्वतन

  • व्याख्यात्मकता की प्रधानता

  • स्पष्टीकरण

  • एक के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग

  • टिकाओ का प्रयोग

  • अति अलंकारिता के स्थान पर सहज शब्दो का प्रयोग।




डी. इरासमस ( 15 वीं सदी)


एक डच मानवतावादी, भाषाविद, धार्मिक विचारक,ओर अनुवादक थे। उन्हे मध्यकाल की अन्तिम कड़ी माना जाता है जहां से पुनर्जागरण की शुरुवात हुई। इन्होंने ईसाई मूलग्रंथो का संपादन किया।


इन्होंने अनुवाद सिद्धान्त पर कुछ महत्वपूर्ण बाते कही जो इस प्रकार है;

अनुवाद में मूल को संरक्षित करने की सर्वथा प्रयास हो।

  • अनुवाद की उक्त स्थति में शब्दानुवाद भी संभव हो।

  • अनुवाद में मूल भाषा की शैली का संरक्षण हो।

  • अनुवादक को अनुवाद कार्य में विशेष छूट नहीं मिलनी चाहैए।

  • अनुवादक को मूल के प्रति विश्वसनीय होना चाहिए।

कुल मिलाकर इन्होंने मूल पाठ की शैली, संरचना, भाव को बनाएं रखने पर विशेष ज़ोर दिया।





आधुनिक पाश्चात्य अनुवाद परंपरा/सिद्धांत 


1950 में अंतर्राष्ट्रीय फेडरेशन ऑफ ट्रांसलेटर्स की स्थापना हुई और इसने अनुवाद को एक व्यवसाय के रूप में महत्व स्थापित किया।

आरंभ में जो  स्वतंत्र विद्या नही थी अब स्वतंत्र रूप से स्थापित हो चुका था।

प्राचीन पाश्चात्य अनुवाद परंपरा बाइबल से शुरू हुई थीं अब सभी तक पहुंच चुका था साथ ही अब इसके सिद्धांतो के निर्माण के लिए कई स्कूलों की भी स्थापना हुई जैसे

  1. प्राग स्कूल

विलय मेथिसियस निकोले,रोमन जेकॉब्स, लेवी, विक्टोरिया, आदि अनुवाद सिद्धांत निर्माता इसी स्कूल से संबद्ध थे।


ये अनुवाद को तीन तरह से देखे 

  • अंतर भाषिक अनुवाद ( intralingual)

    • अंत: भाषिक  एक ही भाषा के भीतर होने वाले अनुवाद है जेसे अंग्रेज़ी में शेक्सपियर के पादयबद्ध नाटकों को चार्ल्स लैब ने अंग्रेज़ी में गद्य में अनुवाद किया।(पद्य से गद्य/गद्य से पद्य: शैली में अन्तर, भाषा एक ही है।

  • अंतर्भाषिक अनुवाद ( interlingual)

    • दो भाषा के बीच अंतरण 

  • अंतर प्रतिकात्मक/ प्रतिकानतरण ( intersemiotic)

    • फिल्म या दृश्य रूप देना 

  1. लंदन स्कूल

इसके संस्थापक फॉक्स थे इनके लेख " linguistic एंड translation, linguistic Analysis and translation   मुख्यत तीन बातों को कहता है

  • अनुवाद भाषाई विश्लेषण पर आधारित है

  • अनुवाद का अर्थ पूर्ण अनुवाद Perfect translation नही होता।

  • किन्ही दो भाषाओं में अभिव्यक्ति के स्तर पर समानता नहीं होती अत अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में संभव नहीं हैं।

कैटफोर्ड भी इसी स्कूल से संबद्ध थे उन्होने 1965 में " A linguistic theory of translation" पुस्तक लिखी जिसके आने से अनुवाद के क्षेत्र में एक नया क्रांति आ गई।

  • उन्होने मुक्त और शाब्दिक अनुवाद का भेद बताते हुवे कहा कि भाषा की जो कड़ी अपने तदनुरूप ऊपरी या निचली अनुस्तरण की स्तह पर भाषांतरित हो सकती है वह मुक्त अनुवाद की सूचक है।

  • Translation is the replacement of textual material in one language (SL) by equivalent textual material in another language (TL)

  • अर्थात अनुवाद स्रोत भाषा की पाठ्य सामग्री का लक्ष्य भाषा की समतुल्य पाठ्य सामग्री द्वारा प्रतिस्थापन है।


  1. यूनाइटेड स्टेट्स स्कूल

संस्थापक चोमस्की। इन्होने शब्द और अर्थ के विश्लेषण के द्वारा भाषाई बनावट का अध्यन किया और " jiaozhi" सिध्दांत दिए जिसने अनुवाद और भाषा को लेकर तीन स्थापनाएं प्रस्तुत किए

  • मनुष्य में भाषाई योग्यता सहज और स्वाभाविक है

  • भाषा नियमों से बोझिल नही है

  • भाषा की बाहरी और भीतरी बनावट होती है।

अनुवाद के सन्दर्भ में भाषा की बाहरी भीतरी दोनो पर विषेश ध्यान रखना चाहिए।


  1. स्कूल ऑफ कम्युनिकेशंस

संस्थापक nayada थे। वे अनुवाद मे अर्थ और शैली को महत्व देते है। उनके अनुसार:

  • Translation consists in producing in the receptor language the closest natural equivalent to the message of the source language first in meaning and secondary in style 

  • अर्थात स्रोत भाषा में अभिव्यक्त विचारो को लक्ष्य में अर्थ ओर शैली के स्तर पर यथा संभव और समान स्तर पर अभिव्यक्ति देना ही अनुवाद है।




आधुनिक पश्चात्य अनुवाद सिद्धांत के प्रमूख विचारक


  1. पियर्स; इनका कहना है कि " प्रतीक वह वस्तु है जो किसी व्याख्या के लिए प्रयुक्त होता है।" ये इन्ही प्रतीकों को आधार मानकर अनुवाद कार्य के नियम निर्धारित किए। अनुवाद किसी एक प्रतीक व्यवस्था से अन्य में अभिव्यक्त करना है। जेसे"  घोड़ा" शब्द हिन्दी में एक जानवर के लिऐ एक प्रतीक है अंग्रेज़ी में Horse शब्द अंग्रेज़ी में इसके समानार्थी प्रतीक है।

  2. न्युमार्क: ये अनुवाद प्रक्रिया की दो दिशाएं मानती है इसलिए अनुवाद को दो स्तरों पर तुलना करते हैं

    1. शब्द पर और अर्थ पर

जेसे: मेरे पास चार घोड़े है

I have four horses. सही है वहीं


मेरे परिवार में चार सदस्य हैं।

I have four members in My family. सही है परन्तु इसी को

मेरे परिवार के पास चार सद्स्य है सही नही होगा।

 अत शब्द ओर अर्थ का ध्यान रखते हुए अनुवाद किया जाना चाहिए।


  1. आंद्रे लेफेवेरे: " Chinese and Western thinking on translation" में लिखी है की

  • संस्कृति स्वयं जो अनुवाद को परिभाषित करती है उसका भाषा से कोई संबंध नहीं ओर उसमे मात्र सांस्कृतिक तत्व ही निहित होते है उसका भाषा से कोई संबंध नहीं। जैसे सांस्कृतिक एकरूपता और संस्कृति का अपना स्वरूप।

इस प्रकार विभिन्न पाश्चत्य विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए कितु किसी ने में सर्वमान्य सिध्दांत स्थापित नहींकर पाए। 





प्रमुख आधुनिक पाश्चात्य अनुवाद सिध्दांत


अत समस्त विचारकों एक विचारो के आधार पर कुछ सिंदधांत इस प्रकार माने जा सकते हैं:

  1. संरचनापरक सिध्दांत

  2. अर्थ परक सिद्धनातसमतुलता सिद्धांत

  3. सापेक्षता वाद का सिद्धांत

  4. व्याख्या का सिद्धांत

  5. सांस्कृतिक संदर्भों के एकीकीकरण का सिद्धांत

  6. पुनर्कोडीकरण का सिद्धांत


सरचना परक सिद्धांत


  • भाषा संरचना पर अधारित है

  • केटफोर्ड ने अपनी सिद्धात की व्याख्या भाषा की संरचना के आधार पर करते हैं परन्तु विभिन्न भाषाई स्तरों  की बात करते हुए मुक्तक अनुवाद की बात किए हैं।

  • अनुवाद के रुप तत्वों का महत्व अधिक है।

  •  चोमसकी भी शब्द ओर अर्थ के विश्लेषण भाषा की संरचना के आधार पर करते हैं। 

उपयोग:अनुवाद प्रशिक्षण के दौरान एक अच्छे अनुवादक तैयार करने के लिए सराचना परक सिद्धांत का उपयोग किया जाता है।


अर्थ परक सिद्धांत

रिचर्ड की पुस्तक " Meaning of Meaning" जिसमे भाषा या शब्द के अर्थ पर पर्याप्त चर्चा हुई है।

सैमुअल जानसन कहते हैं " to translate is to change into another language retaining the sense" अर्थात अर्थ की महत्ता स्थापित किया है।

समतुल्यता का सिद्धांत


केटफॉर्ड के अनुसार " अनुवाद एक भाषा के पाठ परक उपादानों का दूसरी भाषा के पाठपरक उपादानों के रुप मे समतुल्यता के सिद्धनात के आधार पर प्रस्तिथापन है।"


नायड़ा, टेवर, पोपोवॉच आदि इस सिद्धांत के समर्थक हैं। इसमें 

  • शाब्दिक अनुवाद : जेसे save skin: चमड़ी बचाना, सही नही बल्की हिन्दी में समतुल्य भाषिक उपादान से इसकी अनुवाद किया जाना चाहिए।

  • भाव प्रतिभाव अनुवाद: यहां भाषिक उपादान के रुप में अभिव्यक्ति पर उतना बल नही होता जीतना संप्रेष्य कथ्य पर। जैसे मुहावरे और लोकोक्ति का अनुवाद। Killing two birds with one stone का हिन्दी में " एक पथ दो काज"

  • शैली प्रति शैली अनुवाद: इसमें भाषा शैली के साथ साथ विभिन्न विधाओं की बात की जाती है । जैसे गद्य का गद्य या पद्य शैली

  • प्रकार्य - प्रति प्रकार्य अनुवाद: जब किसी पारतिकतमक अर्थ का प्रयोग किया जाता है तो उस अर्थ की समतुल्यता को लक्ष्य भाषा में ढूढा जाता है जिसे पाठ्य गूढ़ व संवेदना के रूप में ग्रहण करता है जैसे: 


सापेक्षता वाद का सिद्धांत

इन विद्वानों का मानना है कि अनुवाद प्रक्रिया में स्रोत भाषा के पाठ के भाषिक अभिलक्षणो का लक्ष्य भाषा के पाठ में अंतरण नही किया जाता अपितु प्रकार्य के आधार पर स्रोत भाषा के अभिलक्षणों को लक्ष्य भाषा के अभिलक्षणों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है।


व्याख्या का सिद्धांत

इसमें स्त्रोत भाषा के पाठ का लक्ष्य भाषा में व्यखाया किया जाता है।

डीजी रेजरी का कहना है कि " अनुवाद संभवत टीका टिप्पणी का सार्वाधिक प्रत्यक्ष रूप है"


रोमन जेकोबसन: एक भाषा के शाब्दिक प्रतीकों की अन्य भाषा के शाब्दिक प्रतीकों द्वारा व्याख्या करना अनुवाद है।


एजरा पाउंड: अनुवाद को साहित्यिक पुनर्जीवन मानते हैं।


सांस्कृतिक संदर्भों के एकीकरण का सिद्धांत


प्रत्येक भाषा में अपनी भाषिक सांस्कृतिक विशेषताएं विद्यमान रहती है अत दूसरी भाषा में परिर्वतन करते समय कठिनाई आती है।

अनुवाद एक भाषा में विद्यमान सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भों का दूसरी भाषा में निहित सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भों के बीच पुल का कार्य करता है। अनुवाद एक भाषा का अंतरण नही अपितु संस्कृतियों का अंतरण है।


मेलेंबोस्की " अनुवाद सांस्कृतिक संदर्भों का एकीकरण है" 


पुनर्कोडीकरण का सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार, अनुवाद स्रोत भाषा के पाठ का पहले विकोदीकरण (विश्लेषण)है और इसके बाद कोडीकरण के माध्यम से। अर्थ का लक्ष्य भाषा के पाठ में पुनर्गठन है। 

विलियम फ्रेवल इस सिद्धांत के समर्थक है उनके अनुसार इस कोडिकरण की प्रक्रिया में दो कोड हैं

  • मैट्रिक्स: स्रोत भाषा पाठ 

  • लक्ष्य कोड : लक्ष्य भाषा पाठ






औपचारिक अनुवाद परम्परा: पश्चिम में बाईबल के अनुवाद से शुरु हुई। Old टेस्टामेट ka anuvad 200 bc 



पुनर्जागरण काल: 13 सदी: अनुवाद का स्वर्ण युग 

 न्यू टेस्टामेंट का जर्मन भाषा में अनुवाद

  • सहज शैली, भाषा में अनुवाद पर ज़ोर


इंग्लैंड में अनुवाद परंपरा 9 वी सदी में शुरु, बाईबल का अंग्रेज़ी अनुवाद ,विरोध शुरु



19 वि सदी में पाश्चात्य अनुवाद


  • Dante के महाकाव्य " डिवाइन कॉमेडी" का अनुवाद,

  • कोलरीज द्वारा शिलर की रचना " वालेस्टाइन" का अनुवाद

इस समय यह धारणा थी कि

  • जो अनुवाद करने योग्य है उसका अनुवाद नहींकिया जा सकता है

  • Nothing worth translating,can be translated.

  • अनुवादक को उसकी उपेक्षा नहीं जानी चाहिए।

20 वीं सदी में अनुवाद

  • इस समय तक पाश्चात्य अनुवाद में, अनुवाद को एक उपेक्षित विद्या के रूप में न मानकर एक स्वतंत्र विद्या के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

  • उसका एक प्रमाण  मेक्समूलर द्वारा संपादित और अनेक भाषाविदों द्वारा अनूदित पचास खंडों का " द सीक्रेट बुक ऑफ द ईस्ट" है। 

  • इसका तात्पर्य यह है कि इस सदी में पाश्चात्य अनुवाद साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ।

आधुनिक पाश्चात्य अनुवादको में 


 बेल्जियम के आंद्रे लेफेवेर (20वी सदी) उन्होने 

  • अनुवाद को पुनर्लेखन या मूल पाठ का अपरवर्तन कहा।

  • उन्होने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि एक लेखक की सोच विचार उसकी कृति में सन्निहीत होता है जिसका अनुवाद से दूसरे संस्कृतियों में भी प्रभाव जमता है।

  • उनका कहना है कि अनुवाद एक ऐसा। पुनर्लेखन है जो मूल को कुछ इस तरह प्रस्तुत कृत है जो तत्कालीन प्रभावपूर्ण विचारधाराओं और काव्यदर्शो के अनुरूप हो।

  • अनुवाद जिस प्रकार अपने आप को समझता है अपने संस्कृति को समझता है ,उसका प्रभाव उसके अनुवाद पर भी पड़ता है।

लॉरेंस वेनुति (20 वी सदी)

  • फिलाडेल्फिया के टेंपल में प्राध्यापक v सक्रिय अनुवादक 

  • बुक: Re thinking translation: discourse,subjectivity, ideology 1992

  • उनका मानना था कि एक अच्छा अनुवादक विदेशी पाठ की विदेशिकता को चिपटा नही वरन  पाठक को पता चलना चाहिए की ये कहां की कृति है। अर्थात् वे देशीयकरण के खिलाप थे।







उत्तर आधुनिकता और अनुवाद सिद्धांत



उत्तर आधुनिकता किसी एक व्यक्ति का दर्शन नहीं है। इसकी प्रस्तुति बहुत से विचारकों ने की। यह आधुनिकता की अगली स्थति तो है ही क्योंकि आधुनिकतावादी सोच के नकार में उत्तर आधुनिक दर्शन की प्रस्तुति हुई है ।



उत्तर आधुनिकता एक ऐसा दर्शन है जो आधुनिकता के विरुद्ध नहीं है बल्कि आधुनिकता के आगे की स्थति है।


उत्तर आधुनिकता वाद को वृद्ध पूंजीवाद की संतान मानी जाती है। यह एक आर्थिक और सांस्कृतिक अवस्था है।


सुधीश पचौरी उत्तर आधुनिकता को पूजीवादी विकास की एक नई स्थति मानते हैं। तथा इसके चार संस्करण माने हैं;

  • उत्तर संरचनावाद

  • नव मार्कवाद

  • नव व्यवहार वाद और 

  • स्त्री वाद


उत्तर आधुनिकता बाद की कोई एक परिभाषा नहीं दी जा सकती है क्योंकि वह सामग्रतावाद का विरोधी है। 


जगदीश्वर चतुर्वेदी " कोई उसे छलना कहता है। किसी के लिए चिन्हों की लीला है। किसी के लिए सांस्कृतिक तर्क है। किसी के लिए तर्क का अंत है। किसी के लिऐ इतिहास का अंत है। किसी के लिए विखंडन है। किसी के लिए विकेंद्रण है। किसी के लिऐ बहुलतावाद है। किसी के लिए महावृतांत का अंत है।" 


आधुनिकतावाद vs उत्तर आधुनिकतावाद


  • 19 शताबादी में आधुनिकतावाद की शुरुवाद हुई।

  • आधुनिकतावादी समाजिक शक्तियों को नियंत्रण में नहीं मानता

  • आधुनिकतावाद का प्रमुख तत्व विखंडन है।


उत्तर आधुनिकता बाद की प्रमुख प्रवृत्ति

  •  यह है कि यह समस्त वैज्ञानौक दृष्टियों को नकारता है।

  •  नारी मुक्ति को स्वतंत्र रुप में हल करने का प्रयास,

  •  यौन संबंधों में अप्राकृतिक तत्वों का महत्तव।

  • महाख्यानो का निषेध

  • यथार्थ का अस्वीकार: यह वस्तुओ के पीछे ultimate reality जेसी चीज को नही मानता।

  • यह जीवनशेली संस्कृति, उपभोक्ता वस्तुओं तथा तकनीकों के बारे में ज्यादा विकल्प पैदा कर्ता है।

  • अर्थहिनता एवं संदेह: इसके अनुसार दुनिया सत्य और तर्क से दूर है तथा किसी प्रकार का ज्ञान संभव नही।एक मात्र भाषा ही है जो अस्तित्व से संबंध स्थापित करवाती है। यहां अर्थ की कोई गुंजाइश नहीं। जगत प्याज की तरह है। जीतना छीलेंगे परत मिलेंगे। यह किसी पर विस्वास नही करता। सिद्धनतो पर संदेह, सत्य पर संदेह, अनुभव पर संदेह आदि।

  • विकेंद्रीकरण: उत्तर आधुनिकता केंद्रों को तोड़ती है नए को स्थापित नही करती।(ल्योतर के अनुसार)

  • विसंरचना

  • मृत्यु की घोषणा: इसमें सभी चीजों की मृत्यु के बारे में घोषणाएं कर डाली है क्योंकि सभी चीजों में मशीनी चीज लगाई जा रही है। । यह शारीरिक स्तर पर विसंरच्ना की बात करते हैं शरीर में विद्युत उपकरण, अंग प्रत्यारोपण,, मनुष्य की मूल प्रवृत्ति बदली जा रही है।

अत: उत्तर आधुनिकता कोई एक सिद्धांत नही है बल्कि कई सिद्धांतो का नाम है। यह एक नई सांस्कृतिक अवस्था है। यह बहुलतावादी विचारधारा है अतः इसकी सर्व मान्य परिभाषा नहीं हो सकतीं हैं।








ज्ञानानुशासन ओर अनुवाद


ज्ञानानुशासन का अभिप्राय: (Discipline of Studies) 

  • ज्ञान+ अनुशासन शब्द से बना है।

  • यह अध्ययन की एक शाखा है।

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार अर्थ;A branch of learning or scholarly instructions


अंग्रेजी में इसे एकेडमिक डिसिप्लिन कहा जाता है


  • यह किसी विषय के अध्ययन का सुव्यवस्थित ढांचा है।

अकादिमिको द्वारा किसी क्षेत्र में किए गए शोध, ज्ञान की नई उपलब्धि तथा विश्वविद्यालय अथवा अकादमिक संस्थाओं आदि से मान्यता प्राप्त होने से ही ज्ञान की कोई नई शाखा ज्ञानानुशासन कहलाती है।


अनुवाद के क्षेत्र मे वर्षो से काम हो रहा है। अनुवाद कर्म से लेकर अनुवाद सिद्धांतों आदि की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता का नामकरण तथा लेफेवर ओर सुसन बेसनट द्वारा अनुवाद अध्ययन की ज्ञानानुशासन के रूप में स्थापना तथा तुलनातमक अध्ययन से अलग देखने और उसकी उपयोगिता सिद्ध करने से ही अनुवाद की ज्ञान के एक अनुशासन के रूप।में स्थापना हुई।




तुलनातमक साहित्य: दो या दो से अधिक साहित्यों के बीच तुलना। यह तुलना समाज की भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक अर्थिक, ऐतिहासिक आदि आधारों पर किया जा सकता है।





अनुवाद में संस्कृति की केंद्रीयता

संस्कृति: सम+ कृ संस्कृत  शब्द के मेल से बना है जिसका अर्थ है - साफ़ या परिष्कृत करना।


व्यापक अर्थ: संस्कृति समस्त सीखे हुवे व्यवहार का नाम है जो समाजिक परंपरा से प्राप्त होता है।


अर्थात संस्कृति उन गुणों के समुदाय से हैं जो व्यक्तित्व को परिष्कृत एवं समृद्ध बनाते है।


अरविंद सहज समांतर कोश के अनुसार, संस्कृति अदब, आचार विचार, इतिहास, कलविज्ञान, चरित्र, जातीय, व्यवहार, जीवनमुल्य, परंपरा, प्रथा, रितिरिवज, धरोहर, धर्म, मान्यता, संगीत, समाज, साहित्य , सभ्यता आदि के सम्मलित रुप है।


मरियम बेबस्तर डिक्शनरी के अनुसार, The customary beliefs,social forms,and material traits of a racial, religious,or social group. Is culture.


Cambridge Dictionary: The Way of life, especially the general customs and beliefs,of a particular group of people at a particular time.


अत कुलमिलाकर संस्कृति से तात्पर्य मनुष्य के समग्र विकास से है जिसमें उसका समाजिक,सांस्कृतिक,धार्मिक, आंतरिक,तथा बाहरी विकास होता है। दितीय विश्व युद्ध के पश्चात इसे संस्कृति सम्बंधी अध्ययनों के अनुशासन का विकास हुआ। 1980 90 के दशक में अनुवाद अध्ययन में आया यह सांस्कृतिक मोड़ भी इसी का परिणाम है।




 अनुवाद ओर संस्कृति

अनुवाद ओर संस्कृति का संबंध बहुत पूराना हैं । संस्कृति के ज्ञान के बिना अनुवाद संभव नही। चुकीं अनुवाद संप्रेषण का एक माध्यम है । अनुवाद के  समाज की संस्कृति / साहित्य आदि से जुड़ पाती है। इस प्रकार अनुवाद  संस्कृतियों के संप्रेषण का कार्य करता है।


अनुवाद के लिऐ दो भाषाओं के साथ साथ दो संस्कृतियों का भी ज्ञान आवश्यक है।


सांस्कृतिक संदर्भ में अनुवाद करते हुवे अनुवादक पाठ की संस्कृति, उसकी भाषाई, खान पान, रीति रिवाज, मान्यताओं सम्बंधी विविधता को बारीकी से समझने का प्रयास करते है और लक्ष्य भाषा में उसका समतुल्य ढूढने का प्रयास करते हैं।


 विनय तथा  Darbelnet  द्वारा बताई गई अनुवाद पद्धतियों में मॉड्यूलेशन, समतुल्यता, रूपांतरण, आदि जो प्रकार हैं वे मूलत: सांस्कृतिक अनुवाद के ही उदाहरण है।




सांस्कृतिक मोड़:(cultural turn)

 एंद्रे लेफेवेरे की अवधारणा 

सांस्कृतिक मोड़ के क्षैत्र में इसके प्रवर्तक सूसन बोनेट और आंद्रे लेफेवेर को माना जाता है। इनकी पुस्तक " Constructing Culture" मे स्पष्ट किया है कि अनुवाद वस्तुत एक सांस्कृतिक क्रिया है।उन्होंने इस प्रक्रिया में संस्कृति और परम्पराओं को महत्व दिया है। यह अध्यान चीनी और पाश्चत्य के सन्दर्भ में था।  यह पुस्तक इस दशक में अनुवाद के लिए सांस्कृतिक मोड़ लाने का काम किया ।


अनुवाद अध्यान में आए इस सांस्कृतिक मोड़ अंग्रेजी में जिसे कल्चरल टर्न कहा जाता है,ने अनुवाद की नई सैद्धांतिकी को जन्म दिया। 


लेफेवेरे ने इस काम को और आगे बढ़ाते हुवे अनुवाद को पुन सृजन कहा। उन्होंने अपनी पुस्तक  " Translation, Rewriting and the manipulation of literary fame " में कहा कि - ट्रांसलेशन इस of course, a rewriting and the manipulation of literary fame" 


सुसन बोनेट: the translation turn in cultural studies " में पाठ का संबंध सत्ता से जोड़कर उसके दायरे को और अधिक विकसित किया, Translation of course ,is a primary method of imposing meaning while concealing the power relations that he lie behind the production of the meaning.  अर्थात अनुवाद निश्चित रूप से अर्थ के निर्माण के पीछे छिपे सत्ता संबंधों को छिपाते हुए दूसरी भाषा पर अर्थ थोपने की प्राथमिक पद्धति है।

इस प्रकार अनुवाद में संस्कृति के प्रवेश तथा केंद्रीय में अनुवाद को भाषिक इकाई से निकल कर उसके दायरे का विकास किया और यह सिद्ध किया कि अनुवाद की केंद्रीय इकाई भाषा नही अपितु संस्कृति है। 


सांस्कृतिक मोड़ और परवर्ती चिंतक:

सांस्कृतिक मोड़ के सन्दर्भ में परवर्ती चिंतन के रूप में निम्नलिखित आयामों कों देखा जा सकता है:

  • पुनर्लेखन के रूप में अनुवाद

  • जेंडर और अनुवाद

  • उत्तर औपनिवेशिक अनुवाद सिद्धांत / सत्ता विमर्श

  • असम्मितावादी साहित्य और अनुवाद / स्बाल्टर्न साहित्य का अनुवाद

  • अनुवाद की दृश्यता




 भूमंडलीकरण और अनुवाद

भूमंडलीकरण शब्द अंग्रेजी के ग्लोबलाइजेशन के हिन्दी रूपांतरण है।  इसका प्रयोग अर्थशास्त्रियों ने 1980 के दशक से करना शुरु किया हालांकि समाज शास्त्री 1960 के दशक से ही प्रयोग करने लगे थे। 


भूमंडलीकरण का क्या अर्थ हो, के लिए विभिन्न विद्वानों ने अलग अलग दृष्टिकोण से परिभाषित करने का प्रयास किया है। 


भूमंडलीकरण का शाब्दिक अर्थ - स्थानीय या क्षेत्रीय वस्तुओ या घटनाओं के विश्व स्तर पर रूपांतर की प्रक्रिया है।  जहां पूरे विश्व के लोग मिलकर एक समाज का निमार्ण करता है और साथ मिलाकर काम करता है । यह प्रक्रिया आर्थिक,तकनीकी,सामाजिक,ओर राजनितिक तागतों का सहयोजन है।

हालांकि भूमंडलीकरण शब्द का प्रयोग अक्सर आर्थिक भूमंडलीकरण के सन्दर्भ में किया जाता देखा जाता है। जहां आर्थिक गतिविधियों का भूमंडलीकरण / विश्वव्यापीकरण होता है। सीमाओं का अंत और पूरा विश्व एक ही छत के नीचे आ जाता है।  अर्थात् एक बाजार।


भूमंडलीकरण मुक्त व्यापार ( free Trade) के समर्थक है जहां पर देश की सरकारें जीरो हस्तक्षेप की पॉलिसी अपनाए सबकुछ बाजार ही निर्धारित करे। 


भूमंडलीकरण से अनुवाद में क्या बदलाव / प्रभाव हुआ;

उपभोक्ता संस्कृति में बदलाव: नई आर्थिक नीति जैसे भारत में 1991 में नई आर्थिक नीति लाने के पीछे भूमंडलीकरण का ही प्रभाव था


उपभोग विधि को प्रभावित किया जैसे

  •  व्यक्तिकता में परिवर्तन: आमदनी, व्यवसाय, शिक्षा, प्राथमिकता, पारिवारिक संबंध, जीवन शैली

  • सामाजिक: जनसंख्या,परिवार टूटन, गरीब अमीर

  • सांस्कृतिक: हिंदू मुस्लिम, आदिवासी, पहाड़ी समुदायों में 

  • मनोवैज्ञानिक: स्वयं निर्धारण, विस्वास, आचरण, दृष्टिकोण,सूचना,ज्ञान,अध्ययन , प्रेरणा।

  • वातावरण

  • विज्ञापन

  • आर्थिक लाभ उन्मुखता

  • खाली पान


भूमंडलीकरण बाजार बनाने में भुमिका

  • भारत में फिक्की, एसोचैम, इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स

  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर; 

    • विश्व व्यापार संगठन (WTO)

    • उद्योग समूह

    • फिक्की( गैर सरकारी और अलभकारी संगठन)

    • G8,G20

    • आसियान

    • सार्क (दक्षेस)

भूमंडलीकरण बाजार में भाषा का महत्तव:

  • स्थानीय दबाव : स्थानीय भाषा मे ही वस्तु एव सेवा की उपलब्धि जेसे झारखंड के गांव क्षेत्रों में खोरठा भाषा बोलकर बेजने वाले फेरीवाले की समान अधिक बिकेंगे 

  • प्रबन्धन मे भाषा सर्वैक्षण: कंपनियों के काम काज आदि के प्रबन्धन में

  • एडवरटाइजमेंट में


भूमंडलीकरण बाजार में अनुवाद की भुमिका

  • संचार माध्यमों की प्रकृति: विज्ञापन अधिक से अधिक करने के लिए विभिन्न भाषा में अनुवाद की आवश्यकता

 





लोकोक्ति मुहावरे

जो गरजते हैं वे बरसते नहीं

  • Barking dogs seldom bite

अपनी दही को कोन खट्टा कहता है।

  • Every Potter praises his own pots

यह बेसिर पैर की बात है

  • It is a cock and bull story



उपमा अलंकार


फूल सा चेहरा: Face like a flower


कोमल सी आवाज़:

 like a nightingale's melody 


झील सी आंखें: eyes like lake



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