PGDT MTT 52 notes
Question ⁉️ अनुवाद प्रक्रिया में भाषा और विषय वस्तु के स्तर पर विश्लेषण एवं अर्थ ग्रहण के विविध आयामों का सोदाहरण चर्चा कीजिए।
उत्तर: अनुवाद की प्रक्रिया के अंतर्गत, अनुवाद केसे किया जाता है, इसमें क्या क्या कार्य शामिल है तथा अनुवादक इस कार्य को किस प्रकार से करते है आदि प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास किया जाता है।
अनुवाद को समझने की दो दृष्टियां है;
पाठयपरक दृष्टि और
प्रक्रियापरक दृष्टि।
पाठपरक दृष्टि के केंद्र में मूल रचना और अनुदित कृति के बीच पाए जाने वाले संबंधों की प्रकृति रहती है। इसमें अनुदित पाठ को मूल पाठ से तुलना करते है और देखते है कि यह मूल पाठ के कितना निकट है।
प्रक्रियापरक दृष्टि में अनुदित सामग्री को मूल सामग्री के सम्मुल्य एक स्वायत पाठ के रुप में देखती है और उसे उस प्रक्रिया के परिणाम के रुप में भी ग्रहण करती है जो दो पाठों को सममुल्य ओर समतुल्य बनाती है। इसमें हम इस प्रशन का उत्तर पा सकते हैं - अनुवाद मूल रचना से भिन्न है तो क्यों? । अनुवाद प्रशिक्षण में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहता है।
अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न प्रारूप ;
अनुवाद प्रक्रिया पर जिन विदेशी विद्वानों ने गंभीरतापूर्वक विचार किया है इनमे नाइडा और न्युमार्क के विचार अधिक चर्चित है। जो इस प्रकार है:
नाइडा द्वारा प्रस्तावित अनुवाद प्रक्रिया के प्रारूप
वे अनुवाद को एक वैज्ञानिक तकनीक के रूप में स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार अनुवाद भाषाविज्ञान का एक अनुप्रयुक्त पक्ष है। अत: अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न पक्षों/सोपानों को समझने और उसके विश्लेषण के लिए भाषा वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग आवश्यक है।
उनके अनुसार अनुवाद प्रक्रियां के तीन सोपान है:
विश्लेषण
अंतरण और
पुनर्गठन
कुशल अनुवादक इन तीनो सोपानों को छलांक लगाकर पार कर सकते हैं परन्तु एक नए अनुवादक को क्रमश: तीनो से एक एक करके गुजरना पड़ता है।
इसे आरेख में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:
स्पष्ट है कि इन तीनो सोपानों में एक निश्चीत क्रम है। स्रोत भाषा में पहले से ही रचित मूल पाठ के संदेश को ग्रहण करने के लिए अनुवादक सबसे पहले पाठ का विश्लेषण करता है। पाठ भाषा बद्ध होता है और संदेश भाषिक संरचना के माध्यम से संप्रेषित किया जाता है।
नायडा के इस नियम की सीमाएं: बाईबल का अनुवादक होने के कारण उनका दृष्टि मूलत: एक विशिष्ट प्रकार के पाठ के अनुवाद तक ही सीमित थी। उनके अनुवाद सम्बंधी उद्धहरण भी प्राचीन पाठ, उसमे निहिंत गुढार्थ की पकड़, विकसित तथा अविकसित भाषाओं में संदेश के संप्रेषण की समस्या आदि से जुड़े थे।
न्युमार्क द्वारा प्रस्तावित अनुवाद प्रक्रिया प्रारूप:
इनके द्वारा प्रस्तावित अनुवाद प्रक्रिया प्रारूप नायडा के सामान है पर यह कुछ अपने चिंतन में अधिक व्यापक है इसे निम्नलिखित अारेख में दर्शाया जा सकता है:
इस अरेख से यह स्पष्ट है कि अंतर्क्रमिक अनुवाद के लाइन से गुजरने वाले अनुवादक कम समय में अनुवाद तो कर सकते है परन्तु जो बोधन के रास्ते अभिव्यक्तिकरण होते हुवे लक्ष्य भाषा में अनुवाद करता है वो अधिक बेहतर होता है तथा गलती की संभावना नहीं रहती है।
इसे इस उद्धारण से समझा जा सकता है:
मूल पाठ
No smoking
Judgement has been reserved
अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न चरण;
अंतर क्रमिक अनुवाद
नही धुआं करना/नही धूम्रपान
निर्णय रख लिया गया सुरक्षित
बोधन
Smoking is not allowed here
Judgement will not be announced immediately
अभिव्यक्तिकरण
बीड़ी सिगरेट पीना मना है
निर्णय अभी नही सुनाया जाएगा
पाठ निर्माण (लक्ष्य भाषा में)
धूम्रपान निषेध
निर्णय बाद में सुनाया जाएगा।
3) भूमिका -समस्या प्रारूप
श्रीवास्तव और गोस्वामी ने अनुवाद की प्रक्रिया का एक और प्रारूप प्रस्तुत किया है। उन्होंने एक तरफ़ अनुवाद को प्रतीक सिद्धांत के साथ जोड़कर देखने का प्रयत्न किया है और दुसरी तरफ अनुवाद प्रक्रिया को दो भाषाओं के बीच संप्रेषण व्यापार के सन्दर्भ में देखने की कोशिश की है। उनके अनुसार संदेश का प्रतिकांतरण अनुवाद है।
इसे निम्नलिखित अारेख द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है:
यानी संदेश, संकेतित कथ्य का मर्म होता है जो भाषिक प्रतीक के सन्दर्भ में अभिव्यक्ति और कथ्य के समन्वयन से बंधकर सामने उभरता तो अवश्य है, पर उसके दायरे में बंधा नही होता। जेसे " मन्दिर में जल चढ़ाना" के कई मायने निकाले जा सकते हैं
# To offer Oblations
# To offer holy water
# To offer incense water
# To offer Prayers
इस प्रकार अनुवाद प्रक्रिया के भुमिका समस्या प्रारूप के अनुसार उसके तीन प्रसंग समाने आते हैं:
अर्थग्रहन की समस्या: पाठक को दो स्तरों पर आती है
मूल भाषा की अपनी बनाबट के कारण
पाठ के विषय वस्तु के कारण
शब्दो वाक्यों में संकेतार्थ, सरचनार्थ, प्रयोगार्थ अथवा संप्रितार्थ
जैसे:
किसी की) आंख लगना: निद्रा
किसी से)आंख लगना:प्यार होना
किसी पर)आंख लगना; जलना/लालसा
इसी तरह" गंगा नहाना" (कफ़न) जिसके चार अनुवाद है
To go to the Ganges
To bathe in the Ganges to wash away the sin
To swim in the Ganges to wash away the sins.
To wash their sins in the Ganges
इसी तरह" treatment" शब्द के प्रयोग देखिए
Treatment of Cancer: कैंसर का इलाज
Treatment of the subject matter: विषय वस्तु का प्रतिपादन
Treatment of servant: नौकर के साथ व्यवहार
अत पाठ और पाठक के अनुरूप ही शब्दार्थ होना चाहीए।
अर्थांतरण की समस्या
द्विभाषीक की भुमिका में अर्थतानरण की समस्या का समाधान अनुवादक को कई स्तरों पर करना पड़ता है। कभी वह मूल भाषा की शाब्दिक इकाई को आगत शब्द के रुप में अपनाता है तो कभी उसका भाषांतरित पर्याय ढूढता है। तो कभी व्याख्या करता है। जैसे "कफ़न" उपन्यास में "चमार" शब्द को चार अनुदित रूप में पाते हैं:
Chamar
Cobbler
Tanner
Untouchable leather worker
इसी तरह "रायता" शब्द के चार अनुदित रूप देखने को मिलता है:
Rayta
Curd
Curd with spices
Vegetable salads spiced and pickled in curd
इसके समाधान के लिए पुनर्विन्यास पर बल दिया जाता है;
@पुर्ण पुनर्विन्यास: संपूर्ण अभिव्यक्ति को ही बदल देना जेसे: अंग्रेजी मुहावरे " by tooth and nail" का हिंदी अनुवाद होगा " जी जान से"
@ विश्लेषणात्मक पुनर्विन्यास: इस प्रकार के अंतरण में मूल अभिव्यक्ति के किसी एक इकाई को लेकर उसकी व्याख्या की जाती है जैसे" देवरानी " के लिए अंग्रेजी में अनुवाद होगा" Wife of younger brother
@ संश्लेष्नातामक पुनर्विन्यास: इस प्रकार के अंतरण में मूल भाषा के एक व्यकारानिक प्रकार्य को व्यंजित करने के लिए अनुदित भाषा में किसी अन्य अभिव्यक्ति पद्धति का सहारा लिया जाता है। जेसे अंग्रेजी के उप पद "a" ओर "the" के अंतरण के लिए हिंदी में विभिन्न शब्द क्रम का प्रयोग होता है:
There is a snake in the room.
There is the snake in the room.
इसका हिन्दी अनुवाद
कमरे मे साप है।
साप कमरे में है।
अर्थात जिसके पहले a/the लगा है उसी पर जोर देते हैं।
अंतरण की समस्या: इसमें दो सिद्धांतों का निर्वहन किया जाता है।
पहला, मूल पाठ के सममुल्य अंतरण अर्थात् अनुवादक पाठ में न ही कुछ घटा सकता है और न ही बढ़ा सकता है
दुसरा, समतुल्य अंतरण अर्थात मूल पाठ और अनुदित पाठ में शैली, अभिव्यक्ति में समतुल्यता हो।
जेसे:
Signed by X in the presence of Y and Z.
ख और ग की उपस्थिति में क ने हस्ताक्षर किए।
Question ⁉️ अनुवाद के विविध क्षेत्रों का विस्तार से चर्चा कीजिए।
उत्तर : अनुवाद के निमानलीखित प्रमुख क्षेत्र है:
प्रशासनीक क्षेत्र में
संसद में
न्यायालय में
शिक्षा के क्षैत्र में
साहित्य लेखन में
सांस्कृतिक क्षैत्र मे
धर्म के क्षैत्र में
अंतर्राष्ट्रीय संबंध स्थापित करने में।
वैज्ञान और प्रोद्यौगिकी के क्षैत्र में
संचार में
सामान्य वर्गों में सद्भावना स्थापित करने में। अच्छे संबंध स्थापित करने में।
विज्ञापन में
Q आशु अनुवाद क्या है? आशु अनुवाद ओर सामान्य अनुवाद में समनताओ और अंतर पर प्रकाश डालिए।
उत्तर;
आशु अनुवाद का तात्पर्य: आशु अनुवाद का शाब्दिक अर्थ है शीघ्र अनुवाद। इसे करने वाले को आशु अनुवादक कहते हैं जिसे अंग्रेजी में इंटरप्रेटर (Interpreter) कहते है। आम बोलचाल की भाषा में इनको दुभाषिया कहते हैं।
आशु अनुवाद के अन्य नाम:
मौखिक अनुवाद
वार्ता अनुवाद
तत्काल अनुवाद
प्रमुख भाषाविदों के अनुसार आशु अनुवाद की परिभाषापरिभाषा/नामकरण
@भाषांतरण; डा भोलानाथ तिवारी
@आशु भाषां अंतरण: डा कैलाश चन्द्र भाटिया
@ आशु व्याख्या: डा सतीश कु रोहड़ा
@ आशु अनुवाद: डा रीता रानी पालीवाल
@ वर्तानुवाद: डा ई विश्वनाथ अय्यर
आशु अनुवाद में एक भाषा के कथन को तत्काल किसी दुसरी भाषा अथवा कई भाषाओं में मौखिक रूप से प्रस्तुत किया जाता है।
आशु अनुवाद की प्रक्रिया कागज़ कलम की न होकर मौखिक होती है।
आशु अनुवाद का तात्पर्य है किसी भाषा में कही गई बातों को श्रोताओं तक संप्रेषित करने के लिऐ दुसरी भाषा में प्रस्तुत करना।
इसमें वक्ता भाषण/ अपनी बात कहते जाते हैं और आशु अनुवादक हर वाक्य का अनुवाद करता जाता है।
व्याख्या अथवा निर्वचन, जो वक्ता की बात की व्याख्या के साथ पाठको तक अनुवाद पहुचाता है, वे आशु अनुवादक से भिन्न होता है।
इस प्रकार आशु अनुवाद से तात्पर्य उस सीमित प्रक्रिया से है जिसके अंर्तगत एक भाषा में कही गई बात को तत्काल या संपूर्ण वक्तव्य के तुरंत बाद दुसरी भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।
आशु अनुवाद की मुख्य रुप से दो प्रक्रियाएं/प्रकार होती है;
तत्काल आशु अनुवाद: जब किसी सम्मेलन/सभा/समारोह में दिए जा रहे व्याख्यानों का उसी समय एक या एक से अधिक भाषाओं में अनुवाद प्रस्तुत किया जाए तो उसे Simultaneous Interpretation कहा जाता है।
निरंतर / क्रमिक आशु अनुवाद: जब दो व्यक्तियों के बीच के वार्तालाप को बारी बारी से एक दूसरे की भाषा में उसके कथन के तुरंत बाद अनुदित किया जाए तो उसे Consecutive Interpretation कहा जाता है। इसे आशु वार्ता अनुवाद भी कहा जाता है।
आशु अनुवाद किन क्षेत्रों में होता है?
आवश्यकता
1 सभा सम्मेलन में: सयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, विश्व बैंक, आईएमएफ, आदि। अंतरराष्ट्रीय और अंतर्देशीय सभा सम्मेलनों में आशु अनुवाद की सहायता ली जाती है।
2 बहुभाषी समाज में: भारत विविधताओं वाला देश है जहां " चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर बनी" , इसी लिऐ लोगों को तत्काल समझने अथवा अपनी बात पहुंचाने के लिऐ आशु अनुवाद आवश्यक है। एक कहावत है न " आब आब कर पुता मरा, पानी खाट के नीचे!" अर्थात् बिलायती आदमी ने "आब" /पानी मगता रहा पर वहां के लोग उनकी बात समझ नही पाए और मर गया।
3 अंतर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में। औपचारिक आशु अनुवादक की खूब मांग रहती है। एक दूजे की बात को तत्काल समझने समझाने और आगे की बात जारी रखने के लिऐ आशु अनुवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंतर्राष्ट्रीय संबंध ठीक और प्रभाव पूर्ण बनाने के लिए आशु अनुवाद वैसे ही जरूरी है जेसे मनुष्य को जीवित रहने के लिऐ सांस लेना जरूरी है।
अत : कह सकते हैं कि विभिन्न भाषा भाषी लोगों के बीच परस्पर सांस्कृतिक आदान प्रदान, वैज्ञानिक एवम तकनीकी आविष्कार की जानकारी, तीर्थांतन, पर्यटन, एवं व्यवसाय, संसदीय एवं राजनयिक कार्यकलापों के लिए आशुनुवाद आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।
4 सांस्कृतिक ओर सामाजिक क्रियाकलापों में; कश्मीर से कन्याकुमारी तक, पर्यटन गाइड।
5 संसदीय कार्यों के लिए
6 राजनयिक और विदेशी अतिथियों के लिए।
आशु अनुवाद ओर सामान्य अनुवाद में संबंध
@ मौखिक भाषा ओर लिखित भाषा के सन्दर्भ में
मौखिक भाषा का अनुवाद (आशू अनुवाद) अपेक्षाकृत अधिक कठिन होता है क्योंकि मौखिक भाषा में विषयांतर बहुत अधिक होता है जबकि लिखित भाषा में लेखन का अनुशासन बना रहता है। जैसे वक्त स्वच्छता अभियान के बारे में भाषण दे रहे है, उसी क्रम में बीच में ही विषय छोड़ अमेरिका में स्वच्छता की स्थिती बोलने लगाता है। इसी को विष्यांतरण कहते हैं।
उच्चारण की समस्या। जेसे अमेरिकी अंग्रेजी और इंग्लैंड की अंग्रेजी उच्चारण में आकाश जमीन का अन्तर है। इंग्लैंड में " क्लास" जबकि अमेरिका में " क्लेस" अर्थ का अनर्थ हो सकने का खतरा।
मौखिक भाषा में स्थानीय भाषाओं, बोलियों का बहुत ज्यादा प्रयोग होता है जिससे तुरंत अनुवाद करना मुश्किल होता है।
मौखिक भाषा में वक्त बोलने के साथ साथ अपने शारीरिक हाव भाव से भी बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है जिसके चलते आशु अनुवादक को अनुवाद करने में सहूलियत हो जाती है।
सामान्य अनुवाद में अनुवादक को किसी भी पाठ को पढ़कर समझने और उसके बाद अनुवाद करने की सुविधा उपलब्ध होती है जबकि आशु अनुवादक को वक्ता के कथन को सुनकर तत्काल उसका अनुवाद करना पड़ता है।
सामान्य अनुवाद में किसी शब्द का अर्थ समझ नही आने पर अपने सहयोगी अथवा शब्दकोष की मदद ली जा सकती है जबकि आशू अनुवाद में ऐसी कोई मदद संभव नही।
सामान्य अनुवाद में सोचने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है जबकि आशु अनुवाद में नही।
सामान्य अनुवाद को फिर से सुधा जा सकता है जबकि आशु अनुवाद को सुधारने का समय अथवा कोई गुंजाइश नहीं रहती है।
इस प्रकार का सकते हैं कि सामान्य अनुवाद की प्रक्रिया अपेक्षाकृत अधिक अनुशासित और व्यवहारिक है जबकि आशु अनुवाद की प्रक्रिया जटिल और चुनौतीपूर्ण है। सामान्य अनुवाद में अनुवाद के सभी उपकरण अनुवाद के पास उपलब्ध होते हैं परंतु आशु अनुवाद में अनुवादक की सामान्य ज्ञान , अनुभव और कौशल ही सहायक होता है।
आशु अनुवाद और सामान्य अनुवाद में असमानता
आशु अनुवाद, अनुवाद का प्राचीनतम रूप है क्योंकि पहले मौखिक अनुवाद शुरु हुई होगी तत्पश्चात् लिखित अनुवाद।
डा अय्यर ने आशु अनुवाद ओर सामान्य अनुवाद के बीच संबंध स्थापित करते हुए कहा कि " जब बारी बारी से सुनाने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं तो वह आशु अनुवाद है और जब पत्रादि के अनुवाद की बात करते हैं तो वे सामान्य अनुवाद है।
सामान्य अनुवाद का क्षेत्र अधिक व्यापक है जिसमें पत्राचार, प्रलेख, पुस्तक आदि के अनुवाद शामिल है ।
सामान्य अनुवाद में, अनुवादक को अपने साथी, या किसी अन्य श्रोत से सहायता लेने के लिए समय और वातावरण मिल सकता है, किंतु आशू अनुवादक को इसी कोई भी मदद नहीं मिल सकती क्योंकि इन्हें वक्ता के कथन को समांतर वे में अनुवाद करना होता है।
सामान्य अनुवाद कम कठिन है, जबकि आशु अनुवाद अधिक कठिन है।
सामान्य अनुवाद प्राय: लिखित होती है वहीं आशु अनुवाद प्राय: मौखिक होती है।
सामान्य अनुवाद में अनुवादक को पर्याप्त समय और सहयोग मिल जाता है किंतु आशु अनुवाद में नही।
समानता
दोनों में अनुवाद की आंतरिक प्रक्रिया सामान होती है।
दोनों में अनुवादक का मूल कर्तव्य होता है - मूल भाषा से लक्ष्य भाषा में कही/लिखीं बात को संप्रेषित करना।
भारत में आशु अनुवाद की स्थिति
भारत में आशु अनुवाद का इतिहास बहुत पूराना है। कहा जाता है कि मोहनजोदड़ो के उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है की आज से चार हज़ार साल पहले भी भारत अन्य विदेशी राष्ट्रों से व्यापार करते थे। ओर यह स्वाभाविक है व्यापार तभी संभव हो सकता है जब दोनो में परस्पर संवाद हो। संवाद के लिए दुभाषिया, आशु अनुवादक रहता ही होगा।
जब सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा पढ़ोसी देशों में जा जा कर बौद्ध धर्म के प्रचार किए तो निश्चीत ही उन्होंने भी व्याख्यान वगैरा में आशु अनुवादक की मदद ली होंगी जैसे आज के नेता और महान व्यक्ति लेते हैं।
इसी तरह, चीनी यात्री फहियान, हेनसंग, जैसे अन्य विदेशी यात्री आए भारत की तत्कालीन भाषाओं को सीखे। शायद वे एक आशु अनुवादक के रुप में कार्य करते होंगे।
आशु अनुवाद की आंतरिक प्रक्रिया:
वस्तुत: आशु अनुवाद की एक आंतरिक प्रक्रिया है जिसका संबंध श्रवण और वाक् सामंजस्य, ग्रहण ओर त्याग के बिंदु से है।
श्रवण और वाक् का संबंध;
सामान्य अनुवाद में क्रम है: लेखक → अनुवादक → पाठक जबकि आशु अनुवाद में क्रम होता है: वक्ता → आशु अनुवादक→ श्रोता।
आशु अनुवाद में इन तीनो मिलकर एक वृताकार चक्र बनाता है अर्थात परस्पर वाक्त, श्रोता बनते हैं। इसमें पहले वक्ता के कथन को ठीक से सुनकर आशु अनुवादक सारे शब्दों का फटाफट अपने मन मस्तिष्क में चित्र अंकित करते हुवे लक्षित भाषा में प्रस्तुत करता है।
जैसे
वक्ता: I have great pleasure in welcoming you to the 45th Annual General Meeting of IFCI.
आशु अनुवादक: भारतीय आद्योगिक वित्त निगम की 45 वीं वार्षिक महासभा में आपका स्वागत करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।
Note: short form को आशु आनुवादक व्याख्या करके बोलता है ताकि स्पष्टता से सभी को समझ आ जाए।
यहां पर शॉर्ट टर्म का फुल फ़ॉर्म में प्रयुक्ति भी करना होता है, अत आशु अनुवादक को इन बातों की सावधानी रखनी चाहिए।
ग्रहण और त्याग के बिंदु:
स्त्रोता के अनुसार, ही शब्दाली,वाक्यों , मुहावरे आदि का आशू अनुवादक को इस्तेमाल करना चाहिए,
सुनने वाले को आसानी हो इसके लिए आशु अनुवादक वक्ता के शब्दो, कथनों में कुछ परिवरत्न कर सकते हैं जेसे खड़ी बोली को मॉर्डन हिन्दी कह सकता है।
किसी समाज, संस्कृति, धर्म को ठेस पहुंचाने वाले टर्म का प्रयोग आशु अनुवादक को नहीं करना चाहिए।
संक्षिप्तकारों(Abbreviations) जेसे WHO,UN,SCO,RBI आदि का पुर्ण रुप आशु अनुवाद में करे।
बोलते समय अक्सर, वक्ता YOU KNOW,AS YOU KNOW, आदि शब्दो को वाक्यों के बीच बीच में बोलता रहता हे। आशु अनुवादक "जैसा कि आप जानतें है" कहने की जरूरत नही हे।
आशु अनुवाद से अपेक्षाएं:
आशु अनुवाद दो व्यक्तियों या समूहों के बीच संवाद का माध्यम होता है, अत: आशु अनुवाद की सर्वप्रथम अपेक्षा यह है कि वह भाषा शैली एवं संप्रेषणियता की दृष्टि से पूर्णता बोधगमय हो।
अनुवाद के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वह या तो शब्दानुवाद हो सकता है जिसमें अनुवाद की तरह अनुशासन अपनाया जाए या भावानुवाद हो सकता है जिसके अनुवाद में काफ़ी छूट ली जाए।
इस सन्दर्भ में यह कथन बहुप्रचलित है कि अनुवाद उस खूबसूरत पत्नी की तरह होता है जो अति सुन्दर है तो विश्वसनीय नहीं हो सकता ओर यदि विश्वसनीय है तो सुंदर नही हो सकता।
परन्तु आशु अनुवाद भारतीय पत्नी की तरह है जो सुंदर और विश्वसनीय दोनों हो सकतीं हैं। अत
आशु अनुवाद से यह अपेक्षा रखी जाती है कि
इसकी भाषा दुरह ओर बोझिल नही हो,
साथ ही ऐसा भावानुवाद भी न हो कि वक्ता के कथन से हटकर कुछ कहा जाय।
उसे सुंदर और सटीक दोनों होना चाहिए। भाषा सरल और सुबोध हो।
व्यवहारिक शब्दावली का प्रयोग हो।
जैसे भारत का विदेश मंत्री अमेरिका जाता है वहां आशु अनुवादक उनके लिए फॉरेन मिस्टर या एक्सटर्नल मिनिस्टर कहता है तो अधिकांश लोग नही समझ पाएंगे क्योंकि अमेरिका में इस पद को " सेक्रेटरी ऑफ स्टेट" कहा जाता है। अत जैसा देश वैसी भाषा और संस्कृति, वातावरण के अनुरूप अनुवाद किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर कहा जाए तो यह कहा जा सकता है कि एक आशु अनुवादक से मुख्य रुप से निम्नलिखित अपेक्षाएं की जाती है:
उसका व्यक्तित्व आकर्षक होना चाहिए
उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए
उसे नयाचार (प्रोटोकॉल) ओर शिष्टाचार की पूरी जानकारी होनी चाहिए।
अनुवाद पूर्णतया सरल और बोधगामय हो।
वक्ता से यदि विषयांतर या कोई त्रुटि हो जाता है तो आशु अनुवादक को इन त्रुटियों को सुधार कर अनुवाद प्रस्तुत करना चाहिए।
आशु अनुवादक को श्रोता की भाषा, शब्दावली एवं वाक्य विन्यास, मुहावरा आदि की यथासंभव ज्ञान रखना चाहिए।
अनुवाद का प्रस्तुतिकरण विनम्रतापूर्वक होना चाहिए साथ ही उसमे प्रभाव की कमी नहीं होनी चाहिए।
उसे विशेषज्ञ के साथ साथ बहुज्ञ भी होना चाहिए ताकि सही अनुवाद प्रस्तुत कर सके।
मूल वक्ता के कथन की भाषा एवं भावना दोनो की पुर्ण रुप से रक्षा करनी चाहिए।
इस प्रकार आशु अनुवादक सामान्य अनुवादक से अनेक अर्थ में अधिक उत्तरदाई के साथ महत्त्व पूर्ण भुमिका निभाता है क्योंकि उन्हे वक्ता के साथ साथ श्रोता दोनों के भावों, शब्दो की रक्षा करना होता है।
आशु अनुवाद की विशेषताये:
प्राचीनता
शैली गत सहजता: व्यवहारिक अनुवाद
तात्कालिक संप्रेषणीयता
सरलता
सांस्कृतिक सेतु
वैश्वीकरण का अनिवार्य साधन
आशु अनुवाद vs भावानुवाद और सारानुवाद:
भावानुवाद वस्तुत सामान्य अनुवाद का ही एक रूप है जिसमें स्रोत भाषा की सामग्री का शाब्दिक अनुवाद न करके उसके भावों को प्रस्तुत किया जाता है। कार्यालयों, नयायलयो आदि की सामग्री का भावानुवाद नहीं किया जा सकता है।
सारानुवाद: इसमें स्रोत भाषा में कही गई बातों को संक्षिप्त रुप में अनुवाद करके प्रस्तुत किया जाता है। जैसे बड़े रिपोर्ट, साहित्य उपन्यासों का सारानुवाद
तीनो में संबंध: आशू अनुवाद में भावानुवाद और सारानुवाद के कुछ विशिष्ट गुण तो रहते हैं लेकिन ये दोनों से पूर्णतया भिन्न है। ऐसा इसलिये क्योंकि:
सारानुवाद ओर भावानुवाद, दोनो सामान्य अनुवाद के ही भेद है जिसमें किसी कथन का अनुवाद लिखित या मुद्रित रूप में प्रस्तुत किया जाता है जबकि आशू अनुवाद एक वाचिक प्रक्रिया है इसमें वक्ता के भावना को विशेष महत्त्व दिया जाता है
भावानुवाद में कुछ बातों को छोड़ने और एड करने की स्वतंत्रता होती है जबकि आशुनुवाद में नही क्योंकि यहां वक्ता के कथन को तत्काल अनुवाद करना होता है, मगर वही सामग्री रहता हे जो वक्ता ने कही है। वह अपनी इच्छा अनुसार परिर्वतन नही कर सकते हैं।
आशु अनुवाद का लक्षित श्रोता:
यात्री
पर्यटक
तीर्थ यात्री
व्यापारी
राजनयिक वर्ग
संसद सद्स्य
सभा सम्मेलनों के श्रोता
अदालतों के मुकदमे आदि के सन्दर्भ में व्यक्ति
आशु अनुवाद की उपयोगिताएं:
वैज्ञानिक उपलब्धियां,: शोध, खोज,
व्यवसाय
संस्कृति
राजनीति वैश्विक रिश्ते में सुधार
आशु अनुवाद की सीमाएं और संभावनाएं:
#सीमाएं
पहली सीमा: इसकी तात्कालिकता है अर्थात् अनुवादक को सोचने समझने का ज्यादा समय नहीं मिलता। उसे मशीन की तरह तुरंत और लगातार चालू रहना पड़ता है।
वाक्य को शुरु किया तो उसको पूर्ण भी करना है अत यादाश्त भी तीखी रखनी पड़ती है।
जल्दी जल्दी वाक्य को पुरा करने के लिए उसे वाक्य के बनावट, सार्थकता आदि से समझौता करना पड़ सकता है।
संस्थाओं, संगठनों, स्थानों आदि अपरिचित और संक्षिप्त (DRDO, UN..) नामों को पुर्ण रुप में कहने के लिए उन्हे पाता होना चाहिए वो भी तेज फॉलो के साथ। जो कई बार जानते हुवे भी मुंह से उस स्वाभाविक फॉलो में शब्द नही निकलते हैं।
वक्ता और श्रोता दोनों की भाषा को अच्छी तरह जाने, कई बार वक्ता अपने स्थानीय भाषाओं बोलियों में कहने लगते है। जिसका तत्काल अनुवाद करना बड़ी दुराह है।
# संभावनाएं
आशु अनुवाद में अनुवादक स्वय भी एक वक्ता के रुप में भुमिका निभाता है, इस दौरान वह अपने हाव भाव, शारीरिक क्रियाओं से भी अपनी बात को सहजता से स्त्रोताओ तक पहुंचा पाता है। ऐसा अन्यत्र संभव नही।
लिखित अनुवादक को पता नहीं होता है कि उनकी अनुदित सामग्री कब पढ़ी जाएगी मगर आशु अनुवादक को पता रहता हे। की अभी तुरंत हमारे अनुवाद को सुनी जा रही है। इससे अनुवादक को मोटीवेशन मिलता रहता है। ओर वे अपना दायित्व भूलते नही।
Q निम्नालिखित विषयों पर लगभग 250 250 शब्दो में टिप्पणी लिखिए:
क) अनुवाद में कोशाें की उपयोगिता और सीमाएं
ख) मशीनी अनुवाद की चुनौतिया
कम से कम पांच महत्वपूर्ण कोशों के नाम बताइए।
निम्नलिखित हिन्दी शब्दो को हिन्दी वर्णक्रम के अनुसार व्यवस्थित कीजिए:
स्वप्न,
सारिका
संवेदनशील
समुद्र
सिध्दांत
सृजन
सुन्दर
सिवान
संस्कृति
स्वाभाविक
सीलन
समुदाय
संप्रेषण
सौंदर्य
सन्दर्भ
निम्नलिखित अंग्रेजी शब्दो वर्णक्रम के अनुसार व्यवस्थित कीजिए:
Wrangler
Watch
Weitch
Wrist
Womb
Wrestler
Wrong
Worth
Work
Whimsical
Window
Ans.
Watch
Weitch
Whimsical
Window
Womb
Work
Worth
Wrangler
Wrestler
Wrist
Wrong
8. निमानलीखित का रोमन/देवनागरी में लिप्यांतरण कीजिए
9. परिभाषिक शब्द
अंगीकृत परिभाषिक शब्द
अंतर्राष्ट्रीय शब्दो जेसे व्यक्तियों के नाम पर ( वोल्टमिटर, केल्विन,) रासायनिक तत्वों के नाम (ऑक्सीजन,) , पेट्रोल, डीजल, आदि का देवनागरी में लिप्यांतरण कर दिया जाना अंगीकार है।
अनुकूलन परिभाषित शब्द
शब्द को भाषा के अनुरूप ढालना,। संकर शब्द (hybrid words) : आयनीकरण, साबुनीकरण,। इसमें देशी शब्द+विदेशी शब्द=संकर शब्द।
नवनिर्माण परिभाषिक शब्द
जिनका भारतीय भाषाओं में पर्याप्त पर्याय न हो, जिसे अंगीकृत करना संभव नही, उन्हे नव निर्माण कर दिया जाता हैं। जैसे संस्कृत के धातु में प्रत्यय/उपसर्ग लगाकर बनाया जाता है। जेसे
क्रिया से: प्रक्रिया, सक्रिया, अनुक्रिया,
रक्षण: अनुरक्षण, परिरक्षण, आरक्षण, संरक्षण
Copyright,privilege, authority: प्राधिकार
Academy: अकादमी
Deputy director: उपनिदेशक
Director general: महानिदेशक
अनुवाद से बनाए गए परिभाषिक शब्द
Cold war: शीत युद्ध
Acid rain : अम्लीय वर्षा
Workshop : कार्यशाला
Managing director: प्रबंध निदेशक
Iron curtain : लोह पट
Development council: विकास परिषद्
सारानुवाद
सारानुवाद का तात्पर्य/ अर्थ: मूल भाषा से लक्ष्य भाषा में उसी क्रमबद्ध और संक्षिप्त रुप मे किए गए अनुवाद को सारानुवाद कहते हैं।
सारानुवाद जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह सार रूप में अनुवाद होता है। अर्थात जो बात कही गई है उसके " सार" यानी "प्रमुख कथ्य" का अनुवाद।
इस पद्धति में संपूर्ण मूल पाठ का अनुवाद न करके उसके प्रमुख कथ्य का अनुवाद किया जाता है। अर्थात् इसमें दो कार्य साथ साथ किए जाते हैं
कथ्य में प्रमुख बिंदुओ को पहचानना और फिर
उनका अनुवाद करना।
सारानुवाद की आवश्यकता क्यों?
ज्ञान के क्षेत्रों ओर संचार के साधनों के लगातार विकास के कारण अधिक से अधिक सूचनाओं के अध्ययन करना तथा उसको सुरक्षित रखने के लिऐ सीमित उपलब्धता में कम शब्दो में सारानुवाद से ही रखा जा सकता है।
अगर कोई विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध विपुल जानकारियों के केंद्रीय तत्वों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा सकता है, तो वो सारानुवाद ही है।
अर्थात् संकलन, संग्रहित, संप्रेषित, करके गागर में सागर भरना, सारानुवाद है। इसलिए यह जरूरी है।
सारानुवाद के प्रयोग क्षैत्र
पत्र पत्रिकाएं: तमाम सूचना प्रसारित कराने वाली एजिंसियो को राष्ट्रिय ज्ञान/सूचनो को अंतर्राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय खबरों/ज्ञान को राष्ट्रिय एवं स्थानीय भाषाओं में सीमित समय, सीमित पत्र पत्रिकाओ के पन्नो आदि में लाने के में , इसकी प्रयोग क्षेत्र को देखा जा सकता है।
रेडियो और टेलीविजन:
संसद मे: भारतीय संसद में सारानुवाद की विषेश उपयोगिता है। संसद की कार्यवाही हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में होती है, साथ ही स्थानीय/क्षेत्रीय भाषाओं में भी बो कुछ शर्तों सहित बोलने की आजादी है।
क्षेत्रीय और हिन्दी भाषाओं में दी जाने वाली भाषणों की अंग्रेजी एवं हिन्दी में तत्काल अनुवाद अर्थात् आशु अनुवाद की भी व्यवस्था होती है। ताकि सभी को ठीक से सूचनाएं पहुंच सके।
सभा समाप्त के बाद तुरंत सारे कार्यवाहियों का सार में अनुवाद की जाती है। फिर अगले दिन तक सभी सदस्यों तक सारानुवाद पहुंचा दिया जाता है।
गौष्ठियों सम्मेलनों आदि की रिपोर्ट: इनके चर्चाओं, कार्यवाहियों, आदि को विभिन्न भाषाओं में सार रूप में ही अनुवाद किया जाता है।
टिप्प्ण प्रारूपण की प्रक्रिया: सरकारी कार्यालयों में, हालांकि अंग्रेजी और हिन्दी में पत्र लिखने को कहा जाता है, लेकिन अन्य भाषाओ में लिखी पत्रों को समझने और पर्याप्त उत्तर हेतु उनका सारानुवाद किया जाता है।
न्यायालयों में: हालांकि न्यायलयों अधिकांश कार्य अंग्रेजी में ही होता है परंतु आजकल काफ़ी मात्रा में हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्रियां पेश की जाती है, जज को उनके सारानुवादी रुप की आवश्यकता पड़ती है।
साहित्य में सारानुवाद: हालांकि साहित्य में सारानुवाद की उपयोगिता सीमित है, क्योंकि साहित्य में केवल भाव संप्रेषण ही नहीं होता बल्कि भाषा के लालित्य का भी बड़ा महत्त्व होता है। अत; साहित्य का अनुवाद होता है, रूपांतरण होता है, सारानुवाद कम ही। हालांकि देवकीनंदन खत्री के उपन्यास " चंद्रकांता" का सारानुवाद अंग्रेजी में किया गया है।
सारानुवाद ओर सामान्य अनुवाद का संबंध
कोई भी अनुवाद अपने उद्देश्य और प्रविधि की दृष्टि से विशिष्ट होते है;
उद्देश्य की दृष्टि से,
सामान्य अनुवाद
अनुवाद का मुख्य उद्देश्य एक भाषा की कृति का अर्थ लक्ष्य भाषा में यथावत प्रस्तुत करना होता है
सामान्य अनुवाद मूल कृति का प्रतिबिंब होता है, जिसमें भाव के साथ साथ लक्षणिकता पर्याप्त मात्रा में होता है।
सामान्य अनुवाद को मूल पाठ की अनुकृति कहा जा सकता है।
वहीं सारानुवाद में,
सारानुवाद का उद्देश्य सामान्य अनुवाद से भिन्न होता है।
इसमें भाषा की लक्षणीकता की और कम, भाव संप्रेषण तथा संक्षेपण की और अधिक ध्यान दिया जाता है।
इसका उद्देश्य मूल कृति के अर्थ को सुसंगत रूप में प्रस्तुत करना और मूल अर्थ को शैली/शब्दो के आवरण से मुक्त अभिव्यक्त करना होता है।
प्रविधि की दृष्टि से
जहां सामान्य अनुवाद में शब्दो और वाक्यों के बनावट, लक्षिणकता पर पर्याप्त बल दिया जाता है वहीं
सारानुवाद में शब्दो , पदबंधो, ओर वाक्यों के विन्यासों पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है। इसमें इसी भाषा का प्रयोग किया जाता है जो सुक्ष्म रूप में विस्तृत अर्थ की अभिव्यक्ति करने एम सक्षम हो।
सारानुवाद में भाषा की लक्षणीकता को महत्त्व न देकर उसकी सूक्ष्मता, सरलता, ओर बोधगमयता की ओर अधिक ध्यान दिया जाता है।
सारानुवाद में मूल कथ्य के संप्रेषण के लिऐ असंगत उक्ति और पुनरूक्ति शब्दों को त्याग कर केवल सुसंगत अंशों का चयन किया जाता है।
सामान्य अनुवाद में अनुवादक को संपादन की उतनी स्वतंत्रता नही होती जितनी सारानुवाद में निहित है।
सारानुवाद में मूल कृति को काट छांटकर क्रमानुसार संप्रेषित करना होता है जबकि अनुवाद में मूल कृति के काट छांट नही।
सारानुवाद की प्रक्रिया
सारानुवाद को अधिक स्पष्ट , प्रभावी और कारगर बनाने के लिऐ निमानलीखित प्रक्रिया अपनाई जाती है;
1 अर्थ ग्रहण: सारानुवाद की पहली आवश्यकता अर्थ ग्रहण है। इसमें
किसी कृति को एक से अधिक बार ध्यान से पढ़कर उसकी मूल बात/केंद्रीय तत्व को समझना होता है।
मूल पाठ को लेखक ने उदघाटन किया है अथवा वर्णन। भुमिका, विषय का विस्तार, ओर फिर निष्कर्ष जो भी क्रम को लेखक ने अनुसरण किया है वही क्रम में सारानुवाद होना चाहिए। जेसे यदि किसी ने: पर्यावरण संरक्षण पर एक निबन्ध लिखी " इसका सारानुवाद इसमें वर्णित विषयों के कथ्यों के क्रमानुसार यथा क्या है?,अर्थ, क्यों जरूरी है, कोन प्रदूषित कर करा, सारक्षण कराने के तरीके, फायदे, कठिनाइयों, सुझाव।
2 चयन के बिंदु: मूल कृति को अच्छी तरह पढ़कर उसके केंद्रीय विचार ओर क्रम को समझे। लेखक कई बार एक ही बात को कहने के लिऐ विभिन्न प्रकार के उपमा, रूपक, शब्दो यदि का इस्तेमाल करता है, सारानुवाद में इनका त्याग किया जाता है। बशर्ते केंद्रीय विचार बने रहे।
3 मूल पाठ का संक्षेपण ओर पुन: प्रस्तुति; दो प्रकार से किया जा सकता है
पहला, पहले मूल पाठ को मूल भाषा में ही सार करें फिर उनका लक्ष्य भाषा में अनुवाद। नए अनुवादो के लिए उपयुक्त विधि
दुसरा: मूल पाठ को सीधे लक्ष्य भाषा में सारानुवाद करे। यह दीर्घकालिक अनुभव से संभव है।
सारानुवाद की विशेषताओं का उल्लेख करें
सारानुवाद एक प्रकार का संक्षेपण है।
यह सूचनाप्रधान होता है
इसमें विचारो का क्रम में निर्वाह होता है।
संपादन
व्यवहारिक परक: पढ़ने में अच्छा भी लगे।
यह मूल से छोटा होता है।
इसमें कथ्य को कम से कम शब्दो में समेटा जाता है।
इसमें जटिल और अलंकृत भाषा के स्थान पर सरल और संक्षिप्त भाषा का प्रयोग किया जाता है।
इसमें पाठ में उपस्थित अलंकारों, छंदों को अर्थ को बनाए रखते हुवे लुप्त कर दिया जाता है।
इसमें मूल कथ्य से असंबद्ध और असंगत अंशो तथा पुनरुक्तियों को निकाल दिया जाता है।
इसमें मिश्रित वाक्यों को छोटे वाक्यों में प्रस्तुत किया जाता है।
यह सब करने के साथ साथ यह भी ध्यान रखता हे कि संक्षिप्त करने के चक्कर में मूल कथ्य के व्यतिक्रम (कथ्य कोन पहले आया है कोन बाद में) ओर तारतम्य को बनाए रखे।
यह एक सृजनात्मक लेखन कृति है।
इसमें मूल की गंध होती है।
यह अर्थ की दृष्टि से पूर्ण और मूल पाठ के अति निकट होता है।
सारानुवाद ओर भावानुवाद
समानताएं
दोनों में मूल कथ्य को पूरी तरह अनुवाद न करके उसके भाव को ग्रहण करके पुन संप्रेषित किया जाता है।
दोनों में शब्दो को ध्यान में न रखकर उसमें निहित भाव को ध्यान में रखा जाता है।
अर्थव्यजना के आधार पर अनुवाद की जाती है अर्थात भावानुवाद।
असमानताएं
भावानुवाद में मूल पाठ जेसी मौलिकता बनी रहती है जबकि सारानुवाद में नही क्योंकि वहां बातों को संक्षिप्त में कहना होता है।
सारानुवाद सूचनाप्रधन होती है जबकि भावानुवाद मोलिकतापूर्ण।
सारानुवाद आकार की सीमा होती है जबकि भावानुवाद में नहीं।
सारानुवाद में प्रत्येक पद, शब्द, वाक्य, आदि का अंतरण करना आवश्यक नही जबकि भावानुवाद में लगभग किया जाता है।
सारानुवाद में सृजन के साथ साथ संपादन होता है जबकि भावानुवाद में संपादन की गुंजाइश नहीं यह एक प्रकार का मौलिक सृजन है।
भावानुवाद एक नदी की जल धारा के समान है जिसमें स्वाभाविक विस्तार, उतार चढ़ाव आते है जबकि सारानुवाद एक नल की जल धारा के समान जिसे अपने अनुसर नियंत्रित करके आकर और गति प्रदान किया जा सकता है।
भाषाण का सारानुवाद
भाषण को सुनते समय वक्ता के भाषण की मुख्य बातों को भाषण के दौरान ही सूक्ष्म और सांकेतिक वाक्यों, पदबंधों में लिख ली जाती है। बाद में उन्हे क्रम से लक्षित भाषा में अनुवाद कर । हालांकि आज कल इसके लिए टैप रिकॉर्डर की सहायता ली जाती है, से मुख्य बात को दोबारा तिबारा सुनकर सारानुवाद कर दिया जाता है।
सारानुवाद की सीमाएं और संभावनाएं
सीमाएं
इसके द्वारा हमे केवल मूल कृति के आशय की ही जानकारी मिल सकती है। अर्थात् अभिव्यक्ति की पुर्ण परिचय नही होता
पुर्ण मूल कृति से साक्षकत्तर नही होता।
इसमें मूल कृति का गंध होता है किंतु उसका स्वाद नही होता है।
इसमें हम मूल कृति के रस को पहचान तो सकतें है कितुं रस्सावदान नही कर सकते हैं।
इसमें यह खतरा रहता है कि एक ही कृति के कई मतलब एक साथ निकाले जा सकते, ये सारानुवाद में विलुप्त होने का खतरा रहता है।
सारानुवाद पर त्रुटि पूर्ण, गलत, होने का आरोप लगाया जाने का खतरा रहता है।
यही कारण है की समाचार पत्र, ऐसे विवादों से बचने के लिऐ प्राय: वक्तव्य को मूलानुवर्ती अनुवाद में छापते है और सारानुवाद से बचते हैं।
सूचनाप्रधान होने के कारण इसमें मूल पाठ के शैली और सौंदर्य और अलंकरण मिट सकता है।
गद्य का सारानुवाद किया जा सकता है परन्तु पद्य का तो नही। श्रीकांत वर्मा के शब्दों में " यह एक विडंबना है कि पुनर्रचना में कविता नष्ट होती है।"
संभावनाएं
सारानुवाद अपेक्षाकृत एक नई विद्या है।
इसका महत्त्व व्यवहारिक महत्ता पर जुड़ी हुई है।
इसकी उपयोगिता सुचना और ज्ञान के विस्तार से जुड़ी है।
अथाह ज्ञान और सुचना के भंडार को समेटने के लिऐ।
सारानुवाद का एक उदाहरण देखिए
"Much has been said about the debt trap. I heard responsible members speaking that we are going into the debt trap. Well I do not understand that; if that is so,then the finance minister has given the wrong figures . If I can rely on the figures given by the Finance minister in the budget speech,in 1990 - 91, our external debt grew by 8 billion dollars: in 1991 - 92 , it grew by a million dollars; in 1992 - 93 , it grew at the same rate; but this year in the first six months, it is only 300 million dollars;that is one -tenth; that means the rate of growth of external debt is arrested. If that is so,are we going closer to the debt trap or are we going out of it? If these figures are wrong, please tell me. No logic can prove that we are going closer to the trap. In fact,due to the measures taken by the government,we are going out of the debt trap. Furthermore, we are repaying the IMF instalment well ahead of schedule. I congratulate the finance minister on that. This is a reality then where is the question of the country and economy being in doldrums; so many jargons have been used , I don't know.
I do not know why few of the members questioned about the employment exchange figure. Even one or two members from this side were also saying. The persons registered in the employment exchange is an indicator of the unemployment in the country. It is not that all the unemployed are registering in the employment exchange. It is also not true that all those who are registered in the employment exchange are unemployed. Many of the persons,I know myself, registered in the unemployment register have some employment. But,however,the number of persons in the employment register is an indicator of unemployment. If by one year there is a decline of 1.4 per cent in the number of persons in the employment register,why do you feel shy of accepting it as a result of the new measures by the government?"
उपरोक्त पाठ को कई बार पढ़के केंद्रीय समस्या" debt trap and unemployment " समझ में आया।
चलिए सारानुवाद के लिऐ उपयुक्त अंशो का चयन/ रेखांकन करते हैं;
Much has been said about the debt trap. I heard responsible members speaking that we are going into the debt trap. Well I do not understand that; if that is so,then the finance minister has given the wrong figures . If I can rely on the figures given by the Finance minister in the budget speech,in 1990 - 91, our external debt grew by 8 billion dollars: in 1991 - 92 , it grew by a million dollars; in 1992 - 93 , it grew at the same rate; but this year in the first six months, it is only 300 million dollars;that is one -tenth; that means the rate of growth of external debt is arrested. If that is so,are we going closer to the debt trap or are we going out of it? If these figures are wrong, please tell me. No logic can prove that we are going closer to the trap. In fact,due to the measures taken by the government,we are going out of the debt trap. Furthermore, we are repaying the IMF instalment well ahead of schedule. I congratulate the finance minister on that. This is a reality then where is the question of the country and economy being in doldrums; so many jargons have been used , I don't know.
I do not know why few of the members questioned about the employment exchange figure. Even one or two members from this side were also saying. The persons registered in the employment exchange is an indicator of the unemployment in the country. It is not that all the unemployed are registering in the employment exchange. It is also not true that all those who are registered in the employment exchange are unemployed. Many of the persons,I know myself, registered in the unemployment register have some employment. But,however,the number of persons in the employment register is an indicator of unemployment. If by one year there is a decline of 1.4 per cent in the number of persons in the employment register,why do you feel shy of accepting it as a result of the new measures by the government?"
मुख्य विचारों का क्रमबद्ध अनुवाद:
सदस्यों का कहना है कि देश कर्ज के जाल में फंस रहा है।
किंतु वित्त मंत्री के आंकड़ों के अनुसार 1990 - 91 में कर्ज में वृद्धि की दर 8 अरब डॉलर थी, जबकि इस वर्ष (1991 - 92) कर्ज में वृद्धि काफ़ी घट गई है।
सत्य तो यह है कि सरकार के प्रयत्नों के कारण देश, विदेशी कर्ज़ के जाल से निकल रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कर्ज की किस्त इस वर्ष समय पूर्व अदा की जा रही है। देश की अर्थव्यवस्था बीमारू नही है।
यद्यपि सभी बेरोजगार व्यक्ति रोज़गार कार्यालय में पंजीकृत नही होते ओर सभी पंजीकृत व्यक्ति बेरोजगार नही होते, फिरभी, रोजगार कार्यालय के आंकड़े बेरोजगारी के सूचक होते हैं।
यह तथ्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि सरकार के नए उपायों के परिणामस्वरूप इस वर्ष रोज़गार कार्यालय में पंजीकृत व्यक्तियों की संख्या में कमी आई है।
अब तथ्य की पुन: प्रस्तुति/ सारानुवाद
" यद्यपि यह कहा जा सकता है कि देश कर्ज़ जाल में फंस रहा है लेकिन वित्त मंत्री द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार विदेशी कर्ज़ में वृद्धि की दर, जो 1990-91 मे 8 अरब डॉलर थी, इस वर्ष काफ़ी कम हो गईं है । तथ्य तो यह है कि सरकार के प्रयत्नों के कारण देश कर्ज के जाल से निकल रहा हैं।
इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के कर्ज की अदायगी की क़िस्त समय पूर्व चुकाई जा रही है। यह कहना गलत है कि देश की अर्थव्यवस्था कमज़ोर है।
यद्यपि रोजगार कार्यालय में पंजीकरण के आंकड़ों से बेरोजगार की सही संख्या का पता नही चलता किंतु ये आंकड़े बेरोजगारि के सूचक अवश्य है। इस आधार पर यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि इस वर्ष बेरोजगारों की संख्या में कमी आई है।"
अनुवाद के प्रकार
अनुवाद के प्रकारों का विभाजन मुख्यत: तीन आधारों पर किया जाता है -
माध्यम के आधार पर
प्रतीक प्रकार
अन्वयांतर/ अतः भाषिक अनुवाद: एक ही भाषा के अन्दर
भाषान्तर/अंतर भाषिक अनुवाद : दो भाषा के मध्य
प्रतिकांतर/ अंतरप्रतिकात्मक अनुवाद: एक भाषा प्रतीक व्यवस्था से किसी अन्य भाषेतेर प्रतीक में अर्थ का अंतरण किया जाता है।
भाषा प्रकार: भाषा के विभिन्न रूपों: मौखिक लिखित, गद्य, पद्य में किया गया अनुवाद इसी एम आता है । इसकी दो भेद है
उपादान सापेक्ष : पाठ अनुवाद
पाठ अनुवाद
आशु अनुवाद
रुप सापेक्ष: गद्य पद्य के आधार पर अनुवाद
पद्यानुवाद
गद्यानुवाद
लेखन प्रकार : दो लिपियों के बीच होने वाले अनुवाद
लिप्यांकन
लिप्यांतरण
लिप्यांकन: स्रोत भाषा के पाठ को स्रोत भाषा के उच्चारण के आधार पर लिख देना ही लिप्यांकन कहलाता है। जैसे टैप में रिकॉर्ड किए गए पाठ को लिपिबद्ध करना।
लिप्यांतरण का मुख्य आधार स्रोत भाषा में प्रयुक्त लिपि चिन्हों के स्थान पर लक्ष्य भाषा के लिपि चिन्हों का प्रतिस्थापन है। जैसे जंगल को रोमन में " Jungle" लिखना लिप्यांतरण है।
प्रक्रिया के आधार पर और
पाठधर्मी अनुवाद
प्रभावधार्मि अनुवाद
पाठ(कथ्य) के आधार पर
अभिव्यक्ति सापेक्ष अनुवाद: पाठ की रचना और भाषा व्यवस्था के विभिन्न स्तर से इसका संबंध है।
रचना सापेक्ष अनुवाद: कभी पाठ के प्रत्येक अंश का अनुवाद किया जाता है तो कभी किसी अंश का।
पुर्ण अनुवाद
आंशिक अनुवाद
व्यवस्था सापेक्ष अनुवाद: आधार भाषिक तत्वों के विभिन्न स्तर
समग्र अनुवाद
परिसिमित अनुवाद
अर्थ सापेक्ष अनुवाद :
शब्द प्रति शब्द अनुवाद
शाब्दिक अनुवाद
भावानुवाद
छायानुवाद
माध्यम के आधार पर अनुवाद के तीन उप भेद किए जा सकते हैं
प्रतीक प्रकार
भाषा प्रकार और
लेखन प्रकार
अनुवाद के विभिन्न प्रकार की परिभाषाएं
अंत: भाषिक अनुवाद
यह अनुवाद एक ही भाषा के अंर्तगत होने वाला अनुवाद है।
जब किसी एक भाषा की किसी एक प्रतीक व्यवस्था में व्यक्त अर्थ का अंतरण उसी भाषा की किसी अन्य प्रतीक व्यवस्था द्वारा किया जाता है तो इस अनुवाद को अन्व्यांतर या अत: भाषिक अनुवाद कहते हैं।
अर्थात yahn दोनो प्रतीक व्यवस्थाएं एक ही भाषा से सम्बन्धित है। जैसे कोई हिन्दी भाषा में संस्कृतनिष्ठ शैली से उर्दू शैली में या बोलचाल शैली में एक ही अर्थ को व्यक्त करता है तो ऐसी अनुवाद अंत: भाषिक अनुवाद का उद्धरण है।
इसी तरह कोई एक ही भाषा के गद्य को पद्य में अथवा पद्य को गद्य में अनुवाद करता है तो वो भी यही अनुवाद है।
जैसे मुंशी प्रेमचंद ने आरंभ में कुछ उपन्यास उर्दू में लिखे बाद में उनका हिन्दी में अनुवाद किए।
अंतर भाषिक अनुवाद
एक भाषा मे व्यक्त अर्थ को दुसरी भाषा में व्यक्त किया जाना अंतर भाषिक अनुवाद है। इसे भाषान्तर भी कहा जाता है। यहां दो भिन्न प्रतीक व्यवस्थाएं होती है। अनुवाद का वास्तविक क्षेत्र इसी को कहा जाता है।
यहां अनुवाद का दोनों भाषाओं में समान अधिकर होना आवश्यक है।
जो अनुवादक इन दोनों भाषाओं की सामाजिक सांस्कृतिक, सरचनात्मक, प्रकृति, संस्कार आदि से भली भांति परिचित नहीं है तो वे अच्छा अनुवादक नही बन सकता है।
अंतप्रतिकात्मक अनुवाद
जब किसी एक भाषा की प्रतीक व्यवस्था द्वारा व्यक्त अर्थ को किसी भाषेतर प्रतीक व्यवस्था के द्वारा व्यक्त किया जाता है तो उसे अंत प्रतीकात्मक या प्रतिकांतर अनुवाद कहा जाता है। इसमें प्रतीक 1 इसी भाषा से सम्बन्धित होता है जबकि प्रतिक 2 किसी अन्य व्यवस्था से अत: यह भाषान्तर से भिन्न है। जेसे "गोदान " हिन्दी की रचना है इसे हिन्दी में फिल्माया जाने पर केवल प्रतीक (बिम्ब) का परिवर्तन हुआ है जो प्रतिकांतर का उदाहरण है।
आशु अनुवाद
उच्चारित या मौखिक भाषा का अनुवाद आशु अनुवाद कहलाता है। इसे अंग्रेजी में interpretation कहा जाता है। आशु अनुवादक को interpretor कहा जाता है। इसे दुभाषिया भी कहा जाता है। ये अक्सर किसी लाइव भाषण का अन्य भाषाओं में समन्नतर अनुवाद करता है। यह मौखिक प्रकार का अनुवाद है। फिल्मों का डबिंग भी इसी श्रेणी में आता है।
पद्यानुवाद
कविता में किया गया अनुवाद पद्यानुवाद कहा जाता है। पद्यानुवाद करना एक कठिन कार्य है क्योंकि कविता में प्रत्येक शब्द महत्वपूर्ण होता है। इसके साथ ही कविता अनुभूति और शेलीपारक hot है, बिंब, छंद,अलंकार, लय, आदि की सूक्ष्म ज्ञान के द्वारा ही पद्यानुवाद किया जा सकता है। ओर इतना करने पर को अनुवाद होता है वह अनुवाद नही बल्कि पुनर्सृजन हो जाते हैं। इसीलिए कवितानुवाद को पुनर्सृजन अनुवाद के अंतर्गत रखा जाता है।
प्रमुख पद्यानुवादको में
भारतेंदु
पंत
अजेय
कैलाश वाजपाई
फिटजेराल्ड (उमर खेयाब की रूबाइयों का अंग्रेजी अनुवाद)
गद्यानुवाद
मूल पद्य पाठ का गद्य में किया गया अनुवाद गद्यानुवाद कहलाता है। कविता की तुलना में गद्यो का अनुवाद करना सरल होता है क्योंकि यहां कविता की भांति शिल्प, लय,छंद, अलंकार आदि नही होते हैं।
सर्जनात्मक साहित्य: कहानी उपन्यास, नाटक, एकांकी:। यह कल्पना प्रधान होता है । इसका अनुवाद अपेक्षाकृत अधिक कठिन होता है।
प्रयोजन परक साहित्य: पत्रकारिता, आयुर्विज्ञान, प्रोद्यौगिकी, तकनीकी, विधि, बैंकिंग, आदि : यह तथ्य प्रधान होता है ।
लिप्यांकन
इस शब्द का शाब्दिक अर्थ - लिपि में अंकन करना है। अर्थात लक्ष्य भाषा के लिपि में स्रोत भाषा के उच्चारण के अनुरूप लेखन या अंतरण।
अंग्रेजी में इसे Transcription कहा जाता है।
मौखिक भाषाओं (टैप रिकॉर्ड)को लिपिबद्ध करना ही लिपियांकन है।
इसमें भाषिक ध्वनियों के उच्चारित रूप को आधार बनाया जाता है। उच्चारण के अनुरूप या तो थोड़े बहुत अन्तर के साथ या यथावत रूप में लिख दिया जाता है।
जैसे: Chemistry का देवनागरी लिपि में लिप्यांकन करते समय इसके अंग्रेजी उच्चारण को महत्त्व देना है न की वर्तनी (spelling) को पर ध्यान देना है।
कैमेस्ट्री
इसी प्रकार Honest का देवनागरी में ऑनेस्ट होगा।
लिपियांकन करते समय INTERNATIONAL PHONETIC ALPHABET (IPA) को आधार बनाया जाता है।
लिप्यांतरण
अंग्रेजी में इसे ट्रांसलिटरेशन (Transliteration) कहा जाता है।
इसमें स्रोत भाषा की वर्तनी में जो लिपि चिन्ह प्रयुक्त हुवे है उनके लिए लक्ष्य भाषा में प्राप्त लिपि चिन्हों का प्रयोग किया जाता है।
लिपियाँकन में जहां किसी भाषा की ध्वनियों को लिपिबद्ध किया जाता है वहीं लिप्यांतरण में दो भाषाओं की ध्वनियों के साथ साथ लिपि चिन्हों के बीच समानता स्थापित करने के लिए " एक के लिए एक चिन्ह सिध्दांत" को अपनाया जाता है।
जैसे Shut का लिप्यांतरण इस प्रकार होगा;
Shut → /sut/→ शट
इस प्रकार देखा जाय तो लिप्यांकन पहली स्थिति है जिसका संबंध भाषा से है जबकि लिप्यांतरण बाद की स्थिति है जिसका संबंध अनुवाद से है।
पाठ धर्मी अनुवाद
जिस अनुवाद में स्रोत भाषा के पाठ का लक्ष्य भाषा के पाठ में इस प्रकार अंतरण किया जाता है कि मूल पाठ का संप्रेष्य अनुदित पाठ में प्रतिस्थापित हो जाए, वह पाठ धर्मी अनुवाद कहलाता है।
यहां स्रोत भाषा के पाठ के अभिलक्षण लक्ष्य भाषा के पाठ के अभिलक्षणों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है।
यहां यह माना जाता है कि पाठ स्वयं में स्वायत होता है अतः अनुवादक अनुवाद करते समय पाठ से बाहर बिल्कुल न जाए।
यहां पाठ की भाषा संरचना आदि का विश्लेषण कर उसके मूल अर्थ को पहले पकड़ा जाता है फिर उसके अर्थ को अनुदित पाठ में व्यक्त किया जाता है।
अनुदित पाठ में अर्थ को प्रतिस्थापित कार्य समय मूलकृति की संरचना तथा बुनावट को भी ध्यान में रखना होता है।
मुहावरे, लोकोक्तियों,सांस्कृतिक, सामाजिक अभिव्यक्तियों का अनुवाद इसी कोटि के अंर्तगत आता है।
जैसे
To be caught red handed
रंगे हाथों पकड़ा जाना।
To throw dust into one's eyes
आंखों में धूल झोंकना
Black market
कालाबाजार
To add fuel to flame
आग में घी डालना
A drop in the ocean
ऊंट के मुंह में जीरा
प्रभाव धर्मी अनुवाद
पाठ धर्मी अनुवाद में जहां स्रोत भाषा के पाठ की संरचना तथा बुनावट का ध्यान रखना होता है वहीं प्रभाव धर्मी अनुवाद में पाठकों पर पड़े प्रभाव को ध्यान में रखा जाता है।
इसकी अपेक्षा रहती है की पाठक वैसे ही प्राभावित रहे जैसे वे मूल पाठ से होते हो।
जैसे प्रेमचंद के उपन्यास " गोदान" का अनुवाद अंग्रेजी में किया जाता है तो अंग्रेजी के पाठक के मन में वैसे ही प्रभाव पैदा हो जेसे हिन्दी के पाठको का। इसी को प्रभाव धर्मी अनुवाद कहा जाता हैं।
यहां पर मूल्यांकन पाठक पर पड़े परभाव के आधार पर होता है।
ऐसे अनुवाद अनुवाद न लगकर मूल रचना लगाता है।
पुर्ण अनुवाद
जिस रचना में मूल रचना के प्रत्येक अंश का अनुवाद किया जाता है उसे पूर्ण अनुवाद कहा जाता है। यहां मूल पाठ के किसी भी अंश को छोड़ा नहीं जाता है। प्राय: प्रभाव धर्मी अनुवाद ऐसे ही अनुवाद होते हैं इसीलिए ये अनुवाद मौलिक रचना प्रतीत होता है।
आंशिक अनुवाद
जब अनुवाद करते समय मूल कृति के सभी अंशो का विभिन्न कारणों से अनुवाद करना संभव नही होता तब मूल रचना के कुछ अंश को बिना अनुवाद किए लक्ष्य भाषा के लिपि में लिप्यांकन कर दिया जाता है। जेसे हिन्दी के इन शब्दो को अंग्रेजी में अनुवाद संभव नही अतः इनका रोमन में हु ब हू लिखना ही आंशिक अनुवाद है।
चिलम: Chilam
अंगीठी: Angithi
पतीला: patila
प्राय पाठ धर्मी अनुवाद इसी कोटि में आते हैं।
समग्र अनुवाद
इसमें मूल पाठ के सभी भाषिक स्तरों को लक्ष्य भाषा के पाठ में अंतरित कर दिया जाता है। लेकिन व्यवहारिक तौर पर ऐसी अनुवाद संभव नही है क्योंकि अनुवाद कभी भी समरूपी ( Identical) नही होता बल्कि समतुल्य ( equivalent) होता है जिसमें प्राय: मूल का कुछ न कुछ अंश छूट हो जाता है अथवा अनुवादक अपनी ओर से कुछ नया जोड़ देता है।
परिसीमित अनुवाद
परिसिमित अनुवाद में स्रोत भाषा पाठ की भाषा व्यवस्था के किसी एक स्तर पर लक्ष्य भाषा पाठ में अंतरण/प्रतिस्थापन किया जाता है। जैसे भाषा के कई स्तर होते हैं
ध्वन्यतमक स्तर
शाब्दिक स्तर
लाक्षणिक स्तर
व्याकारणिक स्तर आदि
परिसीमित अनुवाद में अंतरण इनमे से किसी एक स्तर पर ही होगा।
शब्द प्रति शब्द अनुवाद
इसमें स्रोत पाठ के प्रत्येक शब्द को केन्द्र में रखकर अनुवाद किया जाता है। अर्थात अनुवाद करते समय वाक्य रचना पर ध्यान न देकर वाक्य में प्रयुक्त शब्दो पर ध्यान दिया जाता है । शब्दो को मूल पाठ के क्रमानुसार ही लक्ष्य भाषा में अनुवाद किया जाता है।
इसमें कोई भी शब्द छोड़ने की अनुमति नहीं होती और न ही अपनी ओर से जोड़ने की ही छूट।
इसे शब्दशः अनुवाद भी कहा जाता है। यह अनुवाद देखने में अटपटा सा लगता है।
शाब्दिक अनुवाद(Literal translation)
शब्दानुवाद में मूल पाठ में आए सभी शब्दो का अनुवाद किया जाता है। यह वाक्य के स्तर पर होने वाला अनुवाद है।
इसमें मूल रचना के एक एक शब्द, पद, पदबंध, उपवाक्य, वाक्य आदि का अनुवाद किया जाता है।
यहां कुछ छोड़ने और अपने और से जोड़ने की अनुमति नहीं होती है।
प्राय सूचनाप्रधान साहित्य, वैज्ञानिक, तकनीकी, तथ्यपरक, परिभाषिक साहित्यों का शब्दानुवाद होता है।
जैसे; I requested you to check your account in the bank.
मैं आपसे बैंक में आपके खाते की जांच का अनुरोध करता हुं। (X)
मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि बैंक में अपने खाते की जांच करें।(✓)
डॉक्टर ने मरीज़ की नब्ज़ देखी।
The doctor saw the pulse of the patient.(x)
The doctor felt the pulse of the patient (✓)
साहित्य सांस्कृतिक, मुहावरे लोकोक्तियों आदि का शाब्दिक अनुवाद नही किया जा सकता है। जबदस्ती करने पर यह अटपटे दिखता है।
जैसे:
It is no use crying over split milk.
फैले हुवे दुध पर रोने से क्या लाभ (x)
जो हो गया उसपर गुस्सा करने से क्या लाभ।(✓)
वह खून का घुट पीकर रह गया
He drank a draught of blood and remained.(x)
भावानुवाद
भावानुवाद, शाब्दिक अनुवाद की विपरीत विद्या है।
इसमें मूल कृति की वाक्य रचनाओ पर ध्यान न देकर उसके मूल भाव को ग्रहण करके अनुवाद करने का प्रयास किया जाता है।
इसमें मूल पाठ के भाव और अर्थ को अनुवाद में पूरी तरह से अभिव्यक्त करने की कोशिश की जाती है।
जिन पाठों का शाब्दिक अनुवाद करना संभव नही होता जैसे साहित्यिक अथवा मुहावरे लोकोक्तियों आदि का इनका भावानुवाद किया जाता है।
It is no use crying over split milk
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
वह खून का घुट पीकर रह गया।
He pocketed the insult.
इसमें मूल पाठ ओर अनुदित पाठ की भाषिक संरचना मे कोई समानता नहीं होता है लेकिन अर्थ ओर भाव समान होते हैं।
छायानुवाद
जिस अनुवाद में मूल पाठ की छाया मात्र हो उसे छायानुवाद कहा जाता है।
इसमें अनुवादक के मन पर मूल पाठ का जो प्रभाव पड़ता है यही प्रधान होता है।
इसमें कथ्य तो वही रहता है केवल सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश बदल जाता है।
इसमें प्राय: मूल पाठ में आए पात्रों के नाम, स्थानों के नाम, परिस्थातियां, परिवेश आदि सभी लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुरूप बदल दिया जाता है।
जैसे: शेक्सपियर के "मर्चेट ऑफ़ वेनिस" नाटक का अनुवाद भारतेंदु हरिश्चंद्र ने "दुर्लभ बधु" के नाम से किया है । यहां इन्होंने सभी पात्रों, वातावरण का भारतीयकरण कर दिया है। यह वस्तुत छायानुवाद का ही उदाहरण है।
अनुवाद की सीमाएं
अनुवाद का पुनरीक्षण
पुनरीक्षण अनुवाद की जॉच और सुधार की प्रक्रिया है जो अनुवाद पुरा हो जाने के बाद की जाती है। अंग्रेजी में इसे Vetting कहते हैं। जो व्यक्ति पुनरीक्षण करता है उसे पुनरीक्षक कहते हैं।
पुनरीक्षक अनुवाद को पुन देखता है, मूल पाठ से मिलान करता है, दोनों की परस्पर तुलना करता है और अपेक्षित सुधार करता है इस प्रक्रिया को अनुवाद को सवारना अथवा उसका संपादन करना कहा जा सकता है।
उपनाम:
अनुवाद की समीक्षा करना (कृति के गुणों का मूल्याकंन, करके सीमाओं और संभावनाओं पर अपनी राय देना) से यह थोड़ी भिन्न है क्योंकि इसमे पुनरीक्षक अपनी राय अथवा टिप्प्णी नही देता है केवल अनुवाद में सुधार और संशोधन करता है।
Revision (दोबारा अवलोकन) भी इसके काफ़ी निकट है।
पुनरीक्षण केसे होता है
मूल पाठ ओर अनुवाद को पढ़ना: पंक्ति दर पंक्ति पढ़ना, एक बार में नही, छूटे अर्थ भावों को जोड़ दे।
अनुवाद ओर मूल पाठ का मिलान/तुलना: कथ्य और भाषा शैली के स्तर पर,
कथ्य गत गलतियों का सुधार: अनुदित पाठ में अपेक्षित सुधार,
जेसे: "I have no reservation about this point." का
"मेरे पास इस मुद्दे पर कोई आरक्षण नहीं है।"
सही अनुवाद
"इस विषय पर मेरा कोई मतभेद/असहमति नही है"
भाषा गत गलतियों का सुधार: कथ्य गत और अर्थगत सुधार के बाद भाषा सम्बंधी त्रुटियों का सुधार मूल पाठ के विष्यानुकूल शब्दावली का प्रयोग लक्ष्य भाषा में हो।
शैली गत सुधार: जैसे
Free treatment for eyes.
मुफ़्त आंखों का इलाज।
आंखों का मुफ़्त इलाज़।
अनुदित पाठ की लक्ष्य भाषा संस्कृति की दृष्टि से जॉच
जैसे: He is as humble as a sheep.
वह भेड़ की तरह विनम्र है।
वह तो बिलकुल गऊ है।।
फॉर्मेट संपादन: मूल पाठ के समतुल्य अध्याय, अनुछेद, पैराग्राफ, अंकन, वर्णाक्षरों , चित्रलेखों का प्रयोग , होना चाहिए जैसे
वर्णांकित संख्याओं a,b,c,d आदि के लिऐ हिन्दी में क , ख, ग, घ प्रयोग करें न की अ, ब, स, द या अ, आ, इ ई आदि,।
मूल संख्यक 1,2,3 आदि का अनुवाद में यही रहने दे
मूल रोमन अंक i,ii,iii आदि को भी वही रहने दे।
पुनरीक्षण कोन करता है?
पुनरीक्षक स्वयं अनुवादक न होकर कोई अन्य व्यक्ति या अनुवादक होते हैं। (संस्था, सरकारी कार्यालय, स्वायत संस्था,
पुनरीक्षण का उदाहरण
Why is infant mortality rate considered a good measure for the development?
अनुवाद
शिशु मरणता दर को विकास के स्तर के मानदंड के रुप में क्यों उपयुक्त माना जाता है?
सुधार के बिंदु
मरण ता
विकास के स्तर के मानदंड
पुनरिक्षत पाठ
शिशु मृत्यु दर को विकास का स्तर मापने का उपयुक्त मानदंड क्यों माना जाता है ?
10.निम्नलिखित का हिंदी मे सारानुवाद कीजिए:
After Independence, India adopted its Constitution on November 26, 1949 that laid
the foundation of independent India. The juncture of India's Independence was an
extremely challenging moment. A nation had just been formed after a painful
separation of one part of the erstwhile unified territory. The challenges came from
multiple directions. On the one hand was a newly formed nation with myriad of
problems like poverty, large scale illiteracy and the agonising suffering of a long
colonial rule. But on the other hand was the aspiration of the new Indian polity, the
deep desire to take the newly formed nation to great heights.
Our great leaders who steered us through the struggle of had foresight of what our
polity should be. The Constitution was expected to shape a nation, nurture a society
and guide future generations for times to come. The Drafting Committee of the
Constitution held 141 meetings over a period of 2 years 11 months and 17 days, and
gave us the basic draft comprising a Preamble, 395 Articles and 8 Schedules. This
was indeed the fetus from which the polity of our great nation was born. Since its
adoption, the Constitution of the country has stood firmly to maintain the unity and
integrity of the nation and at the same time has shown flexibility to ensure the much
required socio-economic transformation. Several amendments have also been made in
the Constitution according to the times.
Today, Indian democracy not only stands strong in the face of many challenges time
throws in its way, but has also carved out a unique identity for itself at the global level
– credit for which goes to the strong structure and institutional set up provided by our
Constitution. The Constitution of India provides for socio-economic and political
democracy. It underlines the commitment of the people of India to achieve various
national goals with a peaceful and democratic approach.
As a matter of fact, our Constitution is not just a legal document, but it is an important
instrument that protects the freedom of all sections of society and provides every
citizen the right of equality without discriminating on the basis of caste, creed, sex,
region, sect or language and ensures that nation remains on the path of progress and
prosperity. Even with a large number of voters and an ongoing continual election
process, our democracy has never fallen prey to instability; instead the successful
conduct of elections proves that our democracy has withstood the test of time. During
this democratic journey spread over seven decades, 17 Lok Sabha and more than 300
state assembly elections have taken place in the country. Indian democracy has
demonstrated to the world, how political power can be transferred in a peaceful
manners.
The separation of powers among the state components has been well defined in Indian
Constitution. The domains of the three organs of the state namely legislature,
executive and Judiciary have their own distinct and independent identity and they are
sovereign in their respective sphere.
The Constitution of India lays special emphasis on the interests of citizens and the
provisions of fundamental rights, as enshrined from Article 12 to Article 35 in Part Ill
of the Constitution, are a major evidence of this. These provisions ensure that all the
citizens of India are treated equally thus work as a unifying force. Today, our
Constitution guarantees six fundamental rights: right to equality, right to freedom,
right against exploitation, right to freedom of religion, cultural and educational rights,
and right to constitutional remedies.
Our Constitution along with the fundamental rights also imposes a number of
fundamental duties on its citizens. Citizens should also adhere to certain basic norms
of democratic conduct and behavior, as rights and duties go hand in hand. We have
our rights and they will always remain with us, but if we as citizens are able to adhere
to our duties and act accordingly, this century will certainly be the century of India.
सारानुवाद:
India adopted its Constitution on November 26, 1949 that laid
the foundation of independent India
A nation had just been formed after a painful separation,but the new Indian polity had the deep desire to take the newly formed nation to great heights.
Our great foresight leaders make the Constitution to shape a nation, nurture a society and guide future generations.
The drafting committee of the constitution held 141 meetings over a period of 2 years 11 months and 17 days and gave us a basic draft comprising a preamble,395 articles,and 8 schedules
After the constitution India stood firmly to maintain the unity and integrity of nation and be more flexible to ensure socio economic transformation.
India amended its constitution to achieve various national goals
Our constitution is a legal document that provides every citizen the right of equality without discrimination on the basis of caste,creed,sex,region,sect or language to ensure regular progress
Even with the largest democracy of world,17 lok sabha and more than 300 state assembly elections have been successfully conducted.
The separation of powers among the states has been well defined in the constitution.The three domain organs namely legislature, executive,and judiciary have their own distinct and independent Identity and sovereign in their respective sphere.
The Constitution lays special provisions to ensure all citizens are equal, Today our constitution guarantees six fundamental rights: right to equality, right to freedom, right against exploitation,right to freedom of religion, cultural and educational rights and rights to constitutional remedies.
Our constitution also imposes a number of fundamental duties on citizens. If we as citizens are able to adhere to our duties and act accordingly,this century will certainly be the century of India.
हिंदी सारानुवाद: एक दर्दनाक विभाजन के पश्चात् स्वतंत्र भारत ने 26 नवम्बर 1949 को अपना सविधान अपनाया। चारों तरफ़ से समस्याओं से घिरी नवगठित राष्ट्र को नई ऊंचाइयों पर ले जानें के लिऐ ही राष्ट्रनेताओ के मार्गदर्शन में गठित संविधान की मसौदा समिति ने 2 वर्ष 11 माह ओर 17 दिनों में 141 बैठकें करके एक प्रस्तावना,395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां प्रदान की। राष्ट्र की एकता और अखंडता को मज़बूत करने के लिए या फिर समाजिक आर्थिक विकास हेतु इनमे आवश्यक संशोधन भी किया गया।
भारत का सविधान सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक लोकतंत्र को मजबूती से बनाए रखा है जो पूरे विश्व के लिऐ अनूठी छाप है।
यह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए एक कानूनी दस्तावेज़ से ऊपर उठकर सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और समता को सुनिश्चित करके इसकी रक्षा करता है।
विशाल मतदाताओं वाले लोकतंत्र होने के बाद भी हमने 7 दशकों में 17 लोकसभा और 300 से अधिक राज्यों के विधान सभा चुनावों का सफल आयोजन किया है जिसने पूरे दुनिया में मिसाल कायम किया है।
हमारे सविधान में राज्य घटकों के बीच शक्तियों के प्रथककरण का स्पष्ट रुप से परिभाषित किया गया है। यहां कार्यपालिका, विधियका ओर नयापालिका एक दूसरे से स्वतंत्र और संप्रभु है।
भारतीय संविधान नागरिकों के हितो की विषेश रक्षा के लिए भाग 3 मे अनुच्छेद 12 से 35 तक छः विशेषाधिकार सामंता, स्वतंत्रता, शौषण के खिलाफ़, धर्म की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक शैक्षिक अधिकार और साविधानिक उपचार का प्रावधान करता है। इसके साथ ही नागरिकों पर कई मौलिक कर्तव्य भी लागु होते है। अगर हम नागरिक अपने कर्तव्यों का सही पालन करें तो यह सदी निश्चित रुप से भारत की होगी।
स्वतंत्रता के बाद, भारत ने 26 नवंबर, 1949 को अपने संविधान को अपनाया जिसने स्वतंत्र भारत की नींव रखी। भारत की स्वतंत्रता का मोड़ एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण क्षण था। तत्कालीन एकीकृत क्षेत्र के एक हिस्से के दर्दनाक अलगाव के बाद एक राष्ट्र का गठन अभी-अभी हुआ था।
चुनौतियां कई दिशाओं से आईं। एक ओर एक नवगठित राष्ट्र था जिसमें गरीबी, बड़े पैमाने पर निरक्षरता और एक लंबे औपनिवेशिक शासन की पीड़ादायक पीड़ा जैसी असंख्य समस्याएं थीं। लेकिन दूसरी ओर नई भारतीय राजनीति की आकांक्षा थी, नवगठित राष्ट्र को महान ऊंचाइयों पर ले जाने की गहरी इच्छा।
हमारे महान नेता, जिन्होंने संघर्ष के माध्यम से हमारा मार्गदर्शन किया, उनकी दूरदर्शिता थी कि हमारी राजनीति कैसी होनी चाहिए। संविधान से उम्मीद की गई थी कि वह एक राष्ट्र को आकार देगा, एक समाज का पोषण करेगा और आने वाले समय के लिए आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगा। संविधान की मसौदा समिति ने 2 वर्ष 11 महीने और 17 दिनों की अवधि में 141 बैठकें कीं, और
हमें एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियों वाला मूल मसौदा दिया।
यह वास्तव में वह भ्रूण था जिससे हमारे महान राष्ट्र की राजनीति का जन्म हुआ था। इसके गोद लेने के बाद से, देश का संविधान राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए मजबूती से खड़ा हुआ है और साथ ही आवश्यक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन सुनिश्चित करने के लिए लचीलापन दिखाया है। में कई संशोधन भी किए गए हैं
संविधान समय के अनुसार
आज भारतीय लोकतंत्र न केवल समय की राह में आने वाली कई चुनौतियों के सामने मजबूती से खड़ा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी एक अनूठी पहचान भी बना चुका है - जिसका श्रेय हमारे द्वारा प्रदान की गई मजबूत संरचना और संस्थागत ढांचे को जाता है। संविधान। भारत का संविधान सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक लोकतंत्र प्रदान करता है।
यह विभिन्न हासिल करने के लिए भारत के लोगों की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है
एक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण के साथ राष्ट्रीय लक्ष्य।
वास्तव में, हमारा संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण साधन है जो समाज के सभी वर्गों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है और प्रत्येक नागरिक को जाति, पंथ, लिंग, लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना समानता का अधिकार प्रदान करता है। क्षेत्र, संप्रदाय या भाषा और यह सुनिश्चित करता है कि राष्ट्र प्रगति के पथ पर बना रहे और
समृद्धि।
बड़ी संख्या में मतदाताओं और एक सतत चुनाव प्रक्रिया के बावजूद, हमारा लोकतंत्र कभी भी अस्थिरता का शिकार नहीं हुआ है; इसके बजाय चुनावों का सफल आयोजन यह साबित करता है कि हमारा लोकतंत्र समय की कसौटी पर खरा उतरा है। सात दशकों में फैली इस लोकतांत्रिक यात्रा के दौरान देश में 17 लोकसभा और 300 से अधिक राज्यों के विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र ने दुनिया को दिखा दिया है कि कैसे शांतिपूर्ण तरीके से राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण किया जा सकता है
तरीका।
राज्य घटकों के बीच शक्तियों के पृथक्करण को भारतीय संविधान में अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है। राज्य के तीन अंगों अर्थात् विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के डोमेन की अपनी अलग और स्वतंत्र पहचान है और वे अपने संबंधित क्षेत्र में संप्रभु हैं।
भारत का संविधान नागरिकों के हितों पर विशेष जोर देता है और संविधान के भाग III में अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक निहित मौलिक अधिकारों के प्रावधान इसका एक प्रमुख प्रमाण हैं। ये प्रावधान सुनिश्चित करते हैं कि भारत के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाता है और इस प्रकार एक एकीकृत बल के रूप में काम करते हैं। आज हमारा संविधान छह मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है: समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के खिलाफ अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार,
और संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
हमारा संविधान मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अपने नागरिकों पर कई मौलिक कर्तव्यों को भी लागू करता है। नागरिकों को भी लोकतांत्रिक आचरण और व्यवहार के कुछ बुनियादी मानदंडों का पालन करना चाहिए, क्योंकि अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं। हमारे पास हमारे अधिकार हैं और वे हमेशा हमारे साथ रहेंगे, लेकिन अगर हम नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करने और उसके अनुसार कार्य करने में सक्षम हैं, तो यह सदी निश्चित रूप से भारत की सदी होगी।
Appreciate your child's uniqueness :
Each child is unique. I can see this in my own tow kids. My daughter loves to be
outdoors, she is an introvert and is sensitvie. She loves to paint and dance. On the
other hand, my son is outgoing and social, and he loves cooking. Storytelling helps to
put my daughter to bed but it only ends up making my son more excited and continue
playing. Everyone keeps quiet so that he can settle down and go to sleep. So, when
my son was born, it was altogether a new learning experience. I realised that you
couldn't have a twenty-point manual on parenting to help you to be the ideal parent.
We all learn from our mistakes.
Take time off for yourself :
Being always closeted with the kids, with no time for yourself, will leave you
frustrated and this will show in your interactions with them. Take time off for yourself
and never feel guilty about it. Find ways to spend the time depending on your
situation – work, study, exercise, meet friends. choose what gives you joy, not
something that adds to the stress. Get as much help and support as possible from
family and friends.
अपने बच्चे की विशिष्टता की सराहना करें:
प्रत्येक बच्चा अद्वितीय है। मैं इसे अपने टो बच्चों में देख सकता हूं। मेरी बेटी बनना पसंद करती है
बाहर, वह एक अंतर्मुखी है और संवेदनशील है। उसे पेंट करना और डांस करना बहुत पसंद है। दूसरी ओर, मेरा बेटा आउटगोइंग और सोशल है, और उसे खाना बनाना बहुत पसंद है। कहानी कहने से मेरी बेटी को सुलाने में मदद मिलती है लेकिन यह मेरे बेटे को और अधिक उत्साहित करती है और खेलना जारी रखती है। हर कोई चुप रहता है ताकि वह आराम से सो सके। तो कब
मेरे बेटे का जन्म हुआ, यह पूरी तरह से सीखने का एक नया अनुभव था। मुझे एहसास हुआ कि आदर्श माता-पिता बनने में आपकी मदद करने के लिए आपके पास पेरेंटिंग पर बीस सूत्रीय मैनुअल नहीं हो सकता। हम सभी अपनी गलतियों से सीखते हैं।
पुनरीक्षण:१ अपने बच्चों की विशिष्टताओं की सराहना करें।
प्रत्येक बच्चा अद्वितीय होता है। मैं इसे अपने दोनों बच्चों में देख सकती हूं। मेरी बेटी घर के बाहर व्यतीत करना पसंद करती हैं, वह अंतर्मुखी और संवेदनशील है। वह चित्रकला और नृत्य की शौकीन है। वहीं मेरे बेटे को समाज से घुलना मिलना भाता है, ओर उसे खाना बनाना बहुत पसंद है। जब भी मैं कोई कहानी कहती हूं तो उसे सुनकर मेरी लड़की सो जाती है किंतु मेरा लड़का और उत्तेजित हो जाता है और खेलने लगता है। फिर हम सब चुप हो जाते हैं ताकि वह सोने चला जाए। जब मेरा बेटा का जन्म हुआ तब वह अपने साथ मेरे लिए कई नई चीजें सीखने का मोका लेकर आया। मुझे यह समझ में आ गया कि तुम्हें आदर्श माता बनाने के लिए बीस सूत्रीय मैनुअल तैयार नही किया जा सकता है। हम सभी अपनी गलतियों से ही सीखते हैं।
अपने लिए समय निकालें :
हमेशा बच्चों के साथ बंद रहना, खुद के लिए समय न होना, आपको छोड़ देगा
निराश हैं और यह उनके साथ आपकी बातचीत में दिखेगा। अपने लिए समय निकालें और इसके बारे में कभी भी दोषी महसूस न करें। अपनी स्थिति के आधार पर समय बिताने के तरीके खोजें - काम करें, पढ़ाई करें, व्यायाम करें, दोस्तों से मिलें। वह चुनें जो आपको खुशी देता है, न कि ऐसा कुछ जो तनाव में जोड़ता है। परिवार और दोस्तों से जितना संभव हो सके मदद और समर्थन प्राप्त करें।
अनुरीक्षण 2
अपने लिए समय निकालें
सदैव अपने बच्चों के साथ समय बिताने और स्वयं के लिए समय बिल्कुल न निकालने से आप बहुत परेशान हो जाएंगे। यह आपके बच्चों के साथ व्यवहार को भी प्रभावित करेगा। कुछ समय अपने लिए निकालिए और ऐसा करने पर खुद को न कोसे। अपनी स्थिति के आधार पर समय बिताने के तरीके खोजें - काम करे, पढाई करे, व्यायाम करें, दोस्तों से मिले। कोई ऐसा काम चुनिये जो आपको खुशी दे, न कि ऐसा कुछ जो आपके तनाव बढ़ा दे।परिवार और दोस्तों से जितनी संभव हो उतनी मदद ओर सहयोग प्राप्त करे।
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